लोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’ से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1 इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र आधुनिक युग के सर्वप्रथम आलोचक हैं.’’ दूसरी तरफ सोच समझ से मुक्त यह भी कहा जाता है कि ‘‘आधुनिक हिन्दी आलोचना का सूत्रपात भारतेन्दुयुग में उपाध्याय पं. बदरीनारायण चैधरी ‘प्रेमघन’ ने किया.’’2 भारतेन्दुयुग में आलोचना की शुरूआत किसने की उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि आलोचना का आरंभिक और विकासात्मक स्वरूप क्या रहा.
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*** भारतेन्दुयुगीन आलोचना |
लोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’ से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1 इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र आधुनिक युग के सर्वप्रथम आलोचक हैं.’’ दूसरी तरफ सोच समझ से मुक्त यह भी कहा जाता है कि ‘‘आधुनिक हिन्दी आलोचना का सूत्रपात भारतेन्दुयुग में उपाध्याय पं. बदरीनारायण चैधरी ‘प्रेमघन’ ने किया.’’2 भारतेन्दुयुग में आलोचना की शुरूआत किसने की उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि आलोचना का आरंभिक और विकासात्मक स्वरूप क्या रहा.
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*** भारतेन्दुयुग : अंतर्जातीय सम्पर्क एवं सांस्कृतिक अस्मिता |
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*** काव्य-निर्णय में सहृदय की भूमिका |
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*** 'दिनकर' की काव्यगत विशेषता |
1). राष्ट्रीय भाव धारा के प्रमुख कवि
रामधारी सिंह की कविताओं में राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी भरी है। उनकी कविताओं को पढ़कर सहज मानव के हृदय में भी राष्ट्र के लिए कुछ कर लुटाने का भाव उमड़ पड़ता है और पराधीन भारत के कवि होने के नाते यह स्वाभाविक भी था। उस दौर के लगभग सभी कवियों या कवयित्रियों की रचनाओं में राष्ट्रीयता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है किंतु इन सभी रचनाकारों से दिनकर इस मामले में थोड़े भिन्न है। एक तरफ जहां राष्ट्रवाद बड़ी संयम के साथ मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी आदि की रचनाओं में आता था तो वहीं दूसरी ओर थोड़े और क्रांति के साथ माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि की कविताओं में विकल्प के साथ या गुंजाइश के साथ परिलक्षित होता था।किंतु इन सब के इतर दिनकर की कविताएँ हर सीमा रेखा को लांघ कर पाठक में हृदय में चिंगारी पैदा कर देता था। वह अक्सर विकल्प विहीन दिखती हैं। उदाहरण के लिए-
पूछेगा बूढ़ा विधाता तो मैं कहूँगा,
हाँ तुम्हारी सृष्टि को हमने मिटाया।
यहाँ कवि सृष्टि को ही मिटा देने की बात करता है क्योंकि उसे यह सृष्टि शोषण से युक्त नजर आती है।
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*** मीरा का काव्य और ‘स्त्रीत्व’ का निर्माण |
मीराबाई जैसी मध्ययुगीन कवयित्री को स्त्री सन्दर्भों में पढ़ना चुनौती भरा काम है। मीरा के सन्दर्भ में अक्सर यह देखा गया है कि उनके व्यक्तिगत जीवन और भक्ति सन्दर्भों को लेकर प्राय: हिन्दी आलोचना का रवैया ‘नारी गौरवान्वयन’ कर पुरुष सन्दर्भों के लिये स्थान सुरक्षित रख करके स्त्री को देवी जैसे शब्दों के मायालोक में कैद कर देता है। मीरा को स्त्री सन्दर्भों में पढ़ने से प्रथमतया स्त्री के परम्परागत तर्क के सारे अभियान उथले और झूठे साबित हो जाते हैं और हिन्दी आलोचना की वह प्रवृत्ति भी छल पूर्ण दिखाई देने लगती है जो तीर को गलत निशाने पर बहुत सोच समझ कर लगाती है। यह आलोचना रचनाकार के उन प्रसंगों को राजी से नहीं तो ज़बरदस्ती उभार देती है जो गौण महत्व रखते हैं। मीरा के बारे में भी इन आलोचकों का रवैया सहानुभूतिपूर्ण होते हुए भी तमाम पूर्वग्रहों से भरा होकर ऐसी बातों में मीरा की महानता और देवीत्व दिखाने की कोशिश करता है जिनसे कि अधिक से अधिक एक व्यक्तिगत कहानी भर ही उभर पाती है। हालांकि यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता कि एक पूरी और साफ कहानी उभर आये, पर ठीक से यह भी नहीं सध पाता और मीरा विधवा या सधवा थी, राणा उसका पति था या देवर था में ही सारी बहस उलझ कर रह जाती है। मीरा के सन्दर्भ में स्त्री प्रश्नों को उठाना इसलिये भी चुनौतीपूर्ण है कि ऐसा करने से ‘भक्त’ के ‘स्त्री’ में बदलने का पूरा उपक्रम खड़ा हो जायेगा, जिससे धार्मिक ढाँचे के खतरे में पड़ने की सम्भावना बढ़ जाती है। धार्मिक छाया का यह दवाब शायद ही कभी हिन्दी आलोचना का पीछा छोड़ पाया है।
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*** रामविलास शर्मा की आलोचना और स्त्री संदर्भ |
ज बाज़ारवाद पर जो लोग अच्छी चर्चा कर रहे हैं वे स्त्रीवादी विमर्श के लोग हैं. बाजार का सबसे बड़ा असर व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन पर पड़ा है. इसने व्यक्तिगत भावनाओं, धार्मिक आस्थाओं और परम्परागत समाज के स्त्रियोचित-पुरुषोचित व्यवहार को लाभ के लिए भुनाया है. औरत की देह के सवाल को नग्नता, वासना, उत्पाद से जोड़ा है और यह सब बाजार की लाभ नीतियों के तहत बड़ी कुशलता से किया गया है. मिडिल क्लास जो दैनंदिन दिनचर्या और रूचियों तक सीमित है वस्तुतः उपभोक्तावादी है. उसके लिए सभी प्रश्न इच्छा-अनिच्छा के प्रश्न हैं. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप में वे गौण हैं. वामपंथ ने बाजार के खतरों और नीतियों को पहले-पहले भांपा लेकिन मजदूर से किसान के संघर्ष तक ही अपनी पहुँच बना सके. नामवर सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था -‘‘हमलोगों ने स्त्रियों पर होनेवाले अत्याचारों पर उतना ध्यान नहीं दिया जितना देना चाहिए था.’’ (स्वाधीनता, पत्रिका, शारदीय विशेषांक, 2000, पृ0 - 28) यह एक ऐसी कमजोरी थी, जिसे यूरोपियन देशों और खासतौर से अमेरिका के वामपंथी दलों ने सबसे पहले पकड़ा.
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*** 'जूही की कली' : युवा पाठ |
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*** ‘लोकवादी तुलसीदास’ |
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*** बालश्रम |
ज बच्चे हमारे सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। वे समाज और संसार के नियंता हैं। नियंता इस दृष्टि से कि उनके द्वारा उस समाज को आगे बढ़ाया जाना है जिसमें उनका पालन हो रहा है, जिसमे उनका बचपन गुज़र रहा है। मानव जीवन के सबसे स्वतंत्र और स्वच्छंद समय को देखा जाए तो निःसंदेह उसका नाम बचपन ही है किन्तु क्या हम यह कह सकते हैं कि हर बचपन में स्वच्छंदता है? क्या बच्चों को माँ की लोरियाँ नसीब हैं? क्या बचपन को खिलौने मिल रहें है? आज हमारे सामने ये गंभीर सवाल हैं। हर वर्ष 12 जून को हम विश्व बालश्रम निषेध दिवस के रूप में मनाते हैं। यह दिवस उन अबोध नौनिहालों के लिए होता है जो होते तो हमारे लाडलों की तरह ही हैं लेकिन गरीबी की गिरफ़्त में इस कदर जकड़ उठते हैं कि उन्हें बचपन की अमीरी का एहसास ही नही होता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में पच्चीस करोड़ छियानबे लाख ऐसे बच्चे हैं जिनकी उम्र 5 से 11 साल के बीच है। इनमें से करीब 1 करोड़ बच्चे श्रमिक हैं। यदि राज्यों को देखा जाए तो तकरीबन उत्तरप्रदेश में 21 लाख, बिहार में 10 लाख, राजस्थान में 8 लाख बाल मज़दूर हैं। आज देश के लगभग सभी ढाबों, होटलों, पंचर की दुकानों या इस तरह के अन्य कामों में बच्चों को देखा जा सकता है। ऐसा नही है कि इन कामों में सिर्फ लड़के ही श्रमिक हैं बल्कि लड़कियां भी इन कार्यों में लगीं हैं। अधिकतर धनाढ्य घरों में आपको लड़के और लड़कियां आपको काम करते दिख जायेंगे जहाँ उनका उत्पीड़न भी होता है।
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*** वैष्णव भक्ति आन्दोलन का अखिल भारतीय स्वरुप |
रतीय इतिहास में मध्यकाल राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक सभी दृष्टि से महत्वपूर्ण था । एक और जहाँ इस्लामी संस्कृति भारतीय सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रही थी तो वहीं इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात भी होता है । साहित्येतिहास में इसे स्वर्णिम काल की संज्ञा दी गई है । “भक्ति आंदोलन ने समय समय पर लगभग पूरे देश को प्रभावित किया और उसका धार्मिक सिद्धांतों, धार्मिक अनुष्ठानों, नैतिक मूल्यों और लोकप्रिय विश्वासों पर ही नहीं, बल्कि कलाओं और संस्कृति पर भी निर्णायक प्रभाव पड़ा।“[1]
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*** सुख की उपभोक्तावादी परिभाषाओं के विरूद्ध : ईदगाह |

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*** एक बीज की तरह : नरेश सक्सेना |
विता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त कर सके. आज की कविता में किस्से कहने का चलन तेज़ी से बढ़ा है. इन किस्सों में विवरण है और विवरणों में व्यक्त होती विडम्बना. विडम्बना आधुनिक कविता को उसकी आतंरिक लय देती है जो गेयात्मक हो यह ज़रूरी नहीं. यह लय आधुनिक कविता का अपना शास्त्र (शब्दावली) है, जिसे उसने आधुनिकता की यात्रा में अर्जित किया है. यहाँ शास्त्र परंपरागत रूप में कविता को बांधता नहीं है बल्कि उसे मुक्त करने का विन्यास है. यही लय कविता की स्वाभाविक गति भी है. चूँकि आज के समय में व्यक्ति की चुनौतियाँ, उसके संघर्ष, और सरोकार तेज़ी से बदले हैं. इसलिए कविता भी अपने पुराने फार्मूले से अलग हुई है. निरंतर परिवर्तित होते हुए विकास के अलग-अलग सोपानों को आधुनिक कविता की बुनावट और विश्लेषण के नए सन्दर्भों के रूप में कवि ने स्वयं प्रस्तावित किया है. यह प्रस्तावना नई और अग्रगामी है. इस प्रस्तावना के भीतर नरेश सक्सेना ने अपनी कविताओं की उपस्थिति बहुत मजबूती के साथ दर्ज करवाई है.
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*** हिन्दी नवजागरण और शिक्षा-चिंतन |
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*** कबीर के बहाने आधुनिकता पर एक बहस |
बीर अपने समय में आधुनिक थे? यह कहने का फैशन-सा चल पड़ा है। इस कथन के पीछे जो विचार काम कर रहा है वह यह कि आधुनिकता कोई बहुत ही उम्दा और मानवीय मूल्य है जिसके बिना कोई भी मानवता का पक्षधर हो ही नहीं सकता। कबीर आधुनिक थे तो बु़द्ध और महावीर भी आधुनिक थे? इसमें कोई शक या गुंजाइश नहीं रहती है। इसके बरक्स कोई यह कहे कि इन्हें आधुनिक कहकर आप इनका अपमान कर रहे हैं तो वह प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जायेगा। क्या हम कभी यह सवाल पूछते हैं कि कबीर, महावीर या बुद्ध इस बर्बर और अवमानवीकृत आधुनिकता का ठप्पा अपने ऊपर लगवाना भी चाहते हैं या नहीं? कबीर जैसा साधारण और सहज व्यक्ति आधुनिक बर्बरता और जटिल पूंजीवाद के दुष्चक्र में पिसते उपभोक्ता को देखकर भी यही कहता की ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए’। दूसरा सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक हैं? और क्या जैसे हम आधुनिक हैं? वैसे आधुनिक कबीर हो सकते थे? क्या उन्हें वैसा आधुनिक होना चाहिए था? आधुनिकता चाहे औपनिवेशक हो या देशज वह आधुनिकता ही रहेगी। क्या हम में देशज आधुनिकता का कोई लक्षण है? जिस आधुनिकता के अन्तर्विरोधों के कारण दो महायुद्धों की त्रासदी मानवता को झेलनी पड़ी हो, परमाणु बमों से हुई अनन्त पीड़ा को भोगना पड़ा हो? हजारों छोटे-मोटे युद्धों में करोड़ों इंसानों का रक्त बहा दिया गया हो, मानवता के अपमान और हृास की कहानी पूरी सदी में बिखरी पड़ी हो, मानवीय गौरव और गरिमा के अवमानना का महाकाव्य जिस विचारधारा ने लिखा हो? उस विचारधारा का ठप्पा कबीर जैसे मानवीय गायक पर लगाने का प्रयास उनका घोर अपमान ही माना जायेगा।
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*** युद्ध के दिनों में प्रेम : उसने कहा था |
लेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। 'सुखमय जीवन और 'बुद्धू का कांटा' की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि 'उसने कहा था' एक त्रासदी। इनमें तीसरी 'उसने कहा था' असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते हुए हिंदी की पहली प्रौढ़ और प्राञ्जल कहानी है। इसकी कथा के गठन के विस्मयजनक चमत्कार, बहुपरतीय अर्थवत्ता, और भाव गहनता पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि शायद अब अलग से कोई टिप्पणी भी फ़ालतू जान पड़े। लेकिन फिर भी, हर बार पढ़ने के बाद इसकी ताजग़ी पुनर्जीवित हो उठती है और कुछ कहने को शेष रह गया सा प्रतीत होता है। 'उसने कहा था' के बहाने यह भी एक उत्तेजक और रोचक परीक्षा संभव है कि पाठकों की अलग अलग पीढ़ियां और अलग अलग दृष्टियां व रुचियां एक ही रचना के लिये अलग अलग प्रतिक्रियाएं कैसे करती हैं, न केवल पीढ़ीगत बल्कि व्यक्तिगत भी।
नयी कहानी के दौर में 'उसने कहा था' में चित्रित प्रेम के सत्य और विश्वसनीयता को लेकर एक रोचक बहस चली थी। उस बहस में उठाये गये प्रश्नों के सिरे से देखा जाय तो पूरी कहानी को एक भावुक अतिरंजना में पगा हुआ पाया गया था जिसे कथानक के संरचना–कौशल ने धारासार अश्रुप्रवाह में बह जाने से बचा लिया है। बहस साप्ताहिक हिन्दुस्तान मेँ छपी थी।
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*** कफ़न : सच की गवाही का अमर दस्तावेज़ |
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*** फ़िल्मी गीतों की समकालीन प्रवृत्तियों पर एक दृष्टि |
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*** ‘क़िस्सा कोताह’ : एक कवि की बहक |
इस अर्थ में ‘किस्सा कोताह’ हिन्दी की पहली और मजेदार ढंग से अकेली ऐसी रचना है जो पाठक की उस ‘एक अजीब-सी लत’ को तोड़ने का काम करती है जिसके चलते पाठक ‘किसी भी चीज को पढ़ने से पहले वह जान लेना चाहता है कि वह जिस किताब को पढ़ रहा है वह क्या है यानी पहले उसकी विधा तय होना चाहिए’. बंधी-बंधाई बनी-बनाई मानसिकता या दूसरे शब्दों में कहें तो दूराग्रहों, पूर्वाग्रहों पर चोट करती राजेश जोशी की ‘किस्सा कोताह’, नयेपन की माँग करती है. भले ही आज के राजनीतिक आर्थिक समीकरणों के बीच यह एक गप्पी की गपड़तान ही क्यों ना लगे. ज़रूरी है इन क़िस्सों का ज़िंदा रहना, बनते रहना, सुनते रहना और सुनाया जाना, जिससे उदासीनता के वातावरण को भंग किया जा सके.
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*** खोजने दो मुझे अपना खुद का वसंत ! |
ज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा और उसके विकास का अवसर देखता था | वह पाठक के संकीर्ण ह्रदय को ऐसा संस्कार देता था जिसमें वह सिर्फ कोई सांस्कृतिक क्रिया मात्र के रूप में सीमित नहीं रह जाती थी बल्कि यह भाव स्थापित करती थी कि प्रकृति ने मनुष्य में जो कुछ अधूरा छोड़ा है उसे वह वासंती मिठास से भरा जा सकता है | यह एक ऐसी स्थिति थी जो साधारणीकरण की प्रक्रिया में जन-मानस की अभिव्यक्ति बन जाती थी और जो कुछ जहाँ था वह उसी रूप में एक परिव्याप्त सौन्दर्य को प्रस्तावित करता था | इसके साथ ही वह ऐसे भावों के साथ लोकमंगल के परीक्षण और संवर्धन के विचारों को भी इतनी कलात्मकता के साथ पिरो कर रखता था जिससे शासकों में बुद्धि और ह्रदय की शुद्धता और साहित्य में आलोचना की परम्परा विकसित होती थी | कभी-कभार ऐसे में लोकधर्म, ऋतु और मिथक के भी अद्भुत प्रयोग देखने को मिलते थे | अभिप्राय यह कि वसंत ऋतु साहित्य और समाज के सम्बन्ध का नवीनीकरण करने का सशक्त माध्यम बन गया था | वसंत आक्रोश को संतुलित और बेहतर बनाने का अवसर साहित्य के द्वारा प्रदान करता था |
साहित्य में वसंत की यह परंपरा एक लम्बे समय या कालान्तारों के साथ चलती रही लेकिन अपने समकालीन पड़ाव पर आते हुए वह इस तरह से बिखरी कि उसका अनुमोदन आज एक बहुत बड़ी नाटकीयता लग सकती है | वह आज अपना तेज खोती हुयी दिखती है | यह परम्परा अचानक नहीं बिखरी है बल्कि समाज और उसमें आने वाले परिवर्तनों की तरह एक प्रक्रिया का प्रतिफलन है | साहित्य और वसंत की यह कहानी समाज के विखंडन और मनुष्य के अधूरेपन को रेखांकित करती है | साहित्य, वसंत और मनुष्य के उभरते इस नए सम्बन्ध की पदचाप हरिशंकर परसाई के निबंध ‘घायल वसंत’ में स्पष्ट सुनने को मिलती है | इस निबंध में परसाई जी ने वसंत की पूरी उपस्थिति को बदल कर रख दिया है | उसे ऋतुराज की भूमिका से निकाल कर मनुष्य की यथार्थवादी प्रासंगिकता से जोड़ कर प्रस्तुत किया है | इसे पढ़ते हुए पाठकों को वसंत के एक नए रंग का आभास होता है और यकीनन पारंपरिक पाठक को एक तगड़ा सांस्कृतिक झटका लगता है |
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*** कुंवर नारायण के काव्य में मिथकीय-चेतना |
व्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयुक्त होने लगा. मिथक शब्द अंग्रेज़ी के ‘मिथ’ का हिंदी रूप है तथा यह शब्द हिंदी जगत को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला. मिथ मूलतः ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है –‘वाणी का विषय’. वाणी का विषय से तात्पर्य है –एक कहानी, एक आख्यान जो प्राचीन काल में सत्य माने जाते थे और कुछ रहस्यमय अर्थ देते थे. मिथ शब्द के कुछ कोशगत अर्थ भी हैं – कोई पुरानी कहानी अथवा लोक विश्वास, किसी जाति का आख्यान धार्मिक विश्वासों एवं प्रकृति के रहस्यों के विश्लेषण से युक्त देवताओं तथा वीर पुरुषों की पारंपरिक गाथा, कथन, वृत्त, किवदंती, परंपरागत कथा आदि. यदि इन सब अर्थों की मीमांसा की जाये तो एक बात सब अर्थों के मूल में किसी न किसी सीमा तक लक्षित है – ‘सबके मूल में कथा तत्व का होना’.















