*** काव्य-निर्णय में सहृदय की भूमिका


रस-विमर्श और रस-प्रक्रिया में साधारणीकरण, संभवतः केन्द्रीय महत्त्व की अवधारणा है, जबकि साधारणीकरण की चर्चा बहुधा नाट्य पर आधारित ही मिलती है. हालाँकि रस को (श्रव्य) काव्य से भी सम्बन्धित मान लिया गया है. फिर भी, इस चर्चा में कतिपय प्रसंग ऐसे आ जाते हैं जिनकी अनिवार्यता प्रश्नास्पद है और कतिपय पक्ष अनालोचित से रह जाते हैं. यद्यपि भारतीय काव्यशास्त्र की एक धारा ने, जिसे आज मुख्य धारा कहा जाता है/ कहा जा सकता है, काव्य की आत्मा को रस बताया है. नाट्य या काव्य के प्रेक्षण अथवा श्रवण से रस साधारणीकृत होकर सहृदय सामाजिक को अनुभूत होता है. रस क्या है? रसास्वाद की प्रक्रिया क्या है? इत्यादि प्रश्नों पर पर्याप्त चर्चा हुई है. यहाँ दो अन्य पक्ष महत्त्वपूर्ण रूप से आलोच्य है - आत्मा, जो कि काव्य के पक्ष में रस है, और सहृदय सामाजिक। भारतीय चिंतन दुरूह की परम्परा में इनकी निष्पक्ष पहचान करना आसान प्रतीत नहीं होता. इसकी अपनी जटिलता है.

भारतीय चिंतन परम्परा में चार्वाकेतर सभी दार्शनिक परम्पराओं ने आत्मतत्व को पर्याप्त महत्त्वपूर्ण माना है. फिर भी, महत्त्व के स्तर एवं गंभीरता में पर्याप्त भेद है. इस लिहाज से भारतीय दार्शनिक चिन्तन धारा को दो मुख्य खेमों में बाँटकर देखा जा सकता है. अर्थात् आत्मतत्व के संज्ञान के प्रति भारतीय धारा ने स्पष्टतः दो दृष्टि अपनाई है, जिन्हें वस्तुवादी एवं ज्ञानवादी कहा जाता है / जा सकता है. वस्तुवादी दृष्टि का प्रतिनिधि सिद्धांत न्याय दर्शन है, जिसे प्रत्येक अवधारणा का लक्षण परिस्पष्ट रूप से, अन्वय और व्यतिरेक विधि से, बता देना आवश्यक लगता है. ज्ञानवादी दृष्टि का प्रतिनिधि सिद्धांत (अद्वैत) वेदान्त दर्शन है, जिसे किसी स्थिति को अवधारणा कहने समझने के बजाए जिज्ञासा का, विमर्श का विषय समझना-कहना ही अभिप्रेत है. इस असम्बद्ध प्रतीत होने वाले दार्शनिक क्षेत्र में प्रविष्ट होने का अभिप्राय यह जानना है कि किस प्रकार इन चिंतन दृष्टियों ने अन्य क्षेत्रों पर अपना सैद्धांतिक वर्चस्व कायम किया है. वस्तुवादी दृष्टि को सामाजिकों (साधारण मनुष्यों) पर किंचित् भी भरोसा नहीं है. जो कुछ भी कहना, समझना होगा - सम्प्रदायविद् ही समझाऐंगे. संक्षेप में, यह नज़रिया जनता को जड़ मानता है. जबकि ज्ञानवादी नज़रिया प्रत्येक व्यक्ति में, सैद्धांतिक रूप से, चिंतन की सम्भावना और जिज्ञासा करने योग्य क्षमता के प्रति विश्वास व्यक्त करता है. चिंतन में उपस्थित द्वैध का यह प्रारंभिक कारण है.

इस दृष्टिभेद की प्रतिच्छाया काव्यशास्त्रीय चिंतन-विश्लेषण पर स्पष्ट नज़र आता है. मसलन, अपने वस्तुवादी आग्रहों के कारण कुछ सम्प्रदायों ने बाह्यार्थवाद को इतना अधिक महत्व दिया कि वहाँ सामाजिक / सहृदय की भूमिका को लगभग शून्य कर दिया गया. इस कोटि के आग्रही सम्प्रदायों में अलंकारवादी, गुण-रीतिवादी, औचित्यवादी को रखा जा सकता है. इन्होंने भोक्ता-ग्राहक-अन्वेषक-आस्वादक मनुष्य को काव्य के प्रसंग में अनिवार्य स्थिति नहीं प्रदान की. सहृदय को ही अन्तिम निर्णायक माननेवाले रसध्वनिवादी की समीक्षा करते हुए काव्यशास्त्र-मर्मज्ञ एवं आधुनिक माने जाने वाले पुरोधा आलोचक, राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपना विवेक सम्मत कुछ इस प्रकार रखा है जिसका अवलोकन इस संदर्भ में आवश्यक है. ‘‘सहृदय के अनुभव को निकष मान लेने पर जहाँ ध्वनिवाद की  सामर्थ्य प्रकट हुई, वहीं उससे उसकी दुर्बलता भी ध्वनित हो जाती है. किसी सहृदय को असुन्दर उक्ति में भी किसी न किसी कोण से सौन्दर्य के दर्शन हो सकते हैं. शब्द, अर्थ आदि काव्य के अंगों को छोड़कर, काव्य-सौंदर्य को उनसे परे मानकर सहृदय प्रतीति के आधार पर उसका मूल्याँकन ध्वनिवाद ने किया, उससे काव्य के निगूढ़ पक्षों का उद्घाटन तो हुआ, पर काव्य को समझने का एक ठोस आधार उनसे छूटता गया. (पृ0.122, संस्कृत का काव्यशास्त्र और काव्य परम्परा)

यहाँ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि इस आधुनिक एवं विदग्ध आलोचक की काव्य निर्धारण के लिए ठोस आधार निर्धारित करने की प्रबल आकांक्षा और किसी असुयोग्य सहृदय द्वारा किसी असुन्दर उक्ति में सौन्दर्य देख लेने के प्रति अतिरिक्त सचेष्टता-जनता को असमर्थ और विश्वास-अयोग्य मानने की उपर्युक्त परम्परा के निर्बहण का ही दृष्टान्त है. इसकी परम्परा नाट्यशास्त्रकार से प्रारंभ होकर, कम से कम, यहाँ तक अवश्य है जिसमें सबकुछ परिस्पष्ट रूप से निर्धारित कर जनता के समक्ष परोसने की तीव्र आकांक्षा और आवेश निहित है. जनता इनकी दृष्टि में अबोध और अपरिपक्व है. जनता पद का प्रयोग सोद्देश्य किया गया है.

यदि कोई सहृदय कथित असुंदर उक्ति में सौन्दर्य के दर्शन करता है तो यह इस बात का संकेत है कि सौन्दर्य का वह पक्ष शास्त्र की अथवा शास्त्रीय बुद्धि की सौन्दर्यमूलक दृष्टि से छूटा हुआ था. इस लिहाज से शास्त्रीयता सौन्दर्य-अन्वेषण के मद्देनज़र अपर्याप्त है. हालाँकि सौन्दर्यशास्त्र की समस्या प्रारंभिक दिनों से अद्यतन विद्यमान है कि सौन्दर्य-निर्णय वस्तुगत है अथवा आत्मगत। दोनों ओर की मान्यताओं के अपने-अपने पक्ष भी हैं और तर्क भी. तो भी समाज के व्यवहार आत्मगत निर्णयों से नहीं चलते, हालाँकि सामाजिक व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति के आत्मगत निर्णयों को अर्थहीन बकवास भी नहीं कहा जा सकता. इस तरह के समानान्तर विवादों के समाधान के लिए आधुनिक दृष्टि ने लोकतांत्रिक-प्रविधि को आजमाया और इससे व्यावहारिक समाधान भी पाये गए. मसलन, सौन्दर्य-प्रतियोगिता. यहाँ सुन्दरतम का निर्णय व्यक्ति-निर्णायकों के आत्मगत निर्णयों के आधार पर औसत-अंक-निर्धारण पद्धति द्वारा किया जाता है. इस विषय में सुविज्ञात है कि सौन्दर्य-निर्णय के कतिपय पुराने प्रतिमान टूटे हैं, बदले हैं. इस प्रविधि से निर्णय के आधार के ठोसत्व पर भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, यद्यपि उसका रूप परिवर्तित अवश्य होता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि, ‘‘सौन्दर्य वस्तुगत सत्ता है. यह सत्ता प्रकृति में है, मनुष्य जीवन और मनुष्य की चेतना में है. सौन्दर्य इन्द्रिय-बोध तक सीमित नहीं है, उसकी सत्ता मनुष्य के भाव-जगत और उसके विचारों में भी है.’’ (रामविलास शर्मा, आस्था और सौन्दर्य, पृ0.36) सौन्दर्य-बोध में लोकदृष्टि, विचाराग्रह आदि का हस्तक्षेप मान्य है. इन पर आधारित निर्णय न तो उपेक्षणीय है, न ही विरूद्ध.

ध्वन्यालोककार प्रसिद्धावयवातिरिक्तं पद से उसी जड़मूलकता का निषेध कर रहे हैं अर्थात् जो है नहीं, उसकी खोज क्योंकि जो है, वह हो चुका है, वह जड़ है. हमारी चेतना उसके कहीं आगे जाना चाहती है. वह गति चाहती है. यह गति भौतिक या यांत्रिक गति नहीं है, अपितु मन की गति है. तैत्तिरीय उपनिषद् (2.7.1) इस मानवीय मद्दाकांक्षा से सुपरिचित है -
‘‘असद्वा इदमग्र आसीत् ततौ वै सदजायत। तदात्मानं स्वयमकुरूत। तस्मात्रत्सुकृतमुच्यत इति यद्वै तत्सुकृतं रसौ वै सः रसं हि एव लब्ध्वा आनन्दी भवति को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् एव ह्येवानन्दयाति’’ अर्थात् (जब मनुष्य कल्पना करने को प्रस्तुत हुआ तो पाता है कि) सामने कुछ भी नहीं है (क्योंकि  जो था, वह स्थिर था, निष्प्रयोज्य था) तो उसने (अपनी कल्पना शक्ति से, ईक्षण शक्ति से) जिस किसी वस्तु की रचना की, वह पहले नहीं थी। इसकी उसने स्वयं ही रचना की। इसका नाम सुकृत अर्थात् सुन्दरतम कृतित्व रखा। यह (ईक्षणा प्रसूत) सुकृत ही रस है। निश्चित रूप से इसी रस को प्राप्त करके निजता सम्पन्न मनुष्य आनन्दित हो उठता है। यदि वह अनुभोक्ता, जो आनंद के उपभोग के समय अनुकर्ता भी होता है, ऐसा विश्वास न रखें कि मेरे हृदयाकाश में आनन्द है तो वह किसी प्रकार का चेतन प्रयास नहीं करेगा। वह स्वयं में सुनिश्चित होता है कि हृदयाकाश ही आनन्दित करता है।

इस प्रकार के आनन्द का विश्वास मनुष्य मन की गति का प्रस्थान-बिन्दु है। अपना देखा हुआ चेहरा बार-बार दर्पण में देखकर मुग्ध होता है। अतिसाधारण सी बात है कि इन्द्रियों की सीमा है। अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन के विषय में स्वाद सम्बन्धी परामर्श उसके कलेवर को मात्र आँखों से देखकर नहीं दिया जा सकता, रसनेन्द्रिय का अनुप्रयोग अनिवार्य है (ज्ञान-लक्षण प्रत्यक्ष से काम नहीं चलेगा)। और फिर, उस उपभोक्ता की रूचि यदि भोजनानुकूल नहीं है, भोजन भले ही सभी पाकशास्त्रीय अनुशासनों के सतर्क अनुमोदनों के साथ बनाया हो, रूचि को तत्काल परिवर्तित नहीं किया जा सकता, न किया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में भोजन में अरूचि असंगत नहीं मानी जाएगी। रूचि-अरूचि कोई अनिवार्य स्थिति नहीं, निर्मित परिघटना है। अ-मांसभक्षियों के लिए मांस-भोजन विद्रूप घटना (विषय) हो सकती है, मांसाहारियों के लिए नहीं।

जिस सौन्दर्य (विषय) तक जिस सहृदय की पहुँच नहीं है, उसके विषय में वह क्या निर्णय दे सकता है। एक प्रति-दृष्टांत लेते हैं, जो शौर्य-पराक्रम किसी वर्ग-विशेष को प्रताड़ित करने हेतु सुविवेचित हो, उसे उस वर्ग के लोग कैसे सराहेंगे? अथवा उस वर्ग-विशेष के लोगों को सहृदय की विशिष्ट योग्यता को बस इस आधार पर खारिज़ कर देंगे कि सौन्दर्य-निर्णय के निमित्त ठोस आधार निश्चित किए जाने हैं अथवा उस सहृदय के निर्णय को अयोग्य-निर्णय मानकर आगे बढ़ चलेंगे?

साहित्य, और कला भी, उस पक्ष की खोज में ही संलग्न हुआ रहता है, जो अद्यतन बुद्धि-अगोचर है, अनावृत्त है। यहाँ ध्वन्यालोक का मत इस पक्ष के लिए अवकाश बनाता है कि कोई सहृदय असुंदर में सौन्दर्य (या सुंदर में सौन्दर्य का अभाव) देख सके। इस पक्ष को बल, प्रश्रय मिलना चाहिए, यह युगानुरूप है। ऐसा होना साहित्य में सामान्य मनुष्य का प्रवेश होना है। इससे साहित्य की सामान्य मर्यादा टूटती है। यही सामान्य मर्यादा जब निरपेक्ष होने लगती है तो वह जड़-मर्यादा होने लगती है। इस प्रकार की मर्यादाओं के जड़ हो जाने के मूल में कोई यशःप्रार्थी भय होता है कि कहीं प्रयोग की नूतनता से तिरस्कृत न कर दिए जाएँ। इन भयभीत कवियों, काव्य-रसिकों की ओर से कविकण्ठाभरण में कहा गया है, ‘‘नास्त्यचोरः कविजनः।’’ अर्थात् सभी कवि चोर हैं। ये सभी ठोस आधार के मारे होते होंगे। ऐसे कविजन की संख्या इतिहास-असम्मत विसात पर बहुत बड़ी है। किन्तु जो चोर है, वह कवि नहीं है, काव्य आस्वादक भी नहीं है। इस प्रसंग में इतना ही कहा जाना पर्याप्त है कि ‘‘साहित्य कोई तैयार माल नहीं है, तो साहित्य की कोई तैयार परिभाषा भी नहीं है।’’ और फिर, ‘‘साहित्य यदि इतिहास को बनाता है तो किसी प्रत्यक्ष कार्रवाई के द्वारा नहीं, बल्कि अपने सर्जन धर्म के द्वारा। सृजनशीलता ही साहित्य की इतिहास-निर्मातृ-शक्ति है। इस सर्जनशीलता की पहचान इतिहास के संदर्भ में होती है।’’ यहाँ नोट करने का सवाल है कि पहचान कौन करता है

हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्य के प्रयोजन की बात कुछ इस प्रकार करते हैं, ‘‘वह (काव्य) जीवन की भाँति ही क्रियाशील, सर्जक और निरन्तर विकासमान वस्तु है। यह वांछनीय है। काव्य सर्जक है, वह मनुष्य की दुनियाँ में नए भावों की सृष्टि करके विधाता के भाव जगत् में वृद्धि करता आ रहा है।’’ (विचार प्रवाह) बात नए भावों की सृष्टि की है जो नए सहृदयों की अपेक्षा रखती है, इसकी कोई निरपेक्ष सत्ता नहीं होती। किन्तु इसी आशय से सम्बन्धित कथन में राधावल्लभ त्रिपाठी ने काव्य-प्रयोजन बताते हुए कविता का विषय, अन्वय-व्यतिरेक विधि से, कुछ इस प्रकार निश्चित किया है-‘‘कविता का विषय जीवन है। इसलिए वह उस धर्म, काम या मोक्ष का निषेध करती है जो जीवन से जुड़ा न हो।’’ (पूर्वोक्त, पृ0.76) अन्तर स्पष्ट है। इसके अपने पर्याप्त कारण हैं। उन कारणों में विमर्श-दृष्टि का स्पष्ट भेद निर्धारित किया जा सकता है। विमर्श-दृष्टि की आलोचना तक पहुँचने से पहले साहित्य-दर्पण के इस मंतव्य से गुज़रना सार्थक होगा, ‘‘काव्य से मन्द-बुद्धि लोग भी आसानी से चतुर्वर्ग की प्राप्ति कर सकते हैं कि राम जैसा आचरण करो, रावण जैसा नहीं।’’ यह एक प्रकार का कोडिफिकेशन है जो आजतक कुछ आचार्यों द्वारा किया जाता रहा है। इसे न तो लोकतांत्रिक माना जा सकता है, न समाज-सम्मत। क्योंकि, यदि बड़े निर्णायकों ने तय कर दिया कि अमुक काव्य में अमुक रस है और इसकी रस-अनुभूति की प्रक्रिया अमुक विधि के द्वारा सम्पन्न होती है। अब सामाजिक क्या करे - विद्वानों की निर्धारित परिपाटी का अनुसरण? कि इस काव्य को पढ़ने का, इस पर रस-निर्णय का ठोस आधार तो प्रस्तावित किया जा चुका है, इसी के आधार पर काव्य-निर्णय करना होगा, रसानुभूति करनी होगी। नहीं। प्रत्येक सहृदय के लिए काव्य की नवीनता बनी रहेगी। वह काव्य एक प्रकार का अंधकार है, अज्ञात-लोक है, जहाँ सहृदय को निज-प्रयासों से रसानुभूति के लिए मार्ग खोलना होगा। इस कार्य में सहायता करेंगे उसके अपने निजी और अर्जित संस्कार, भाषा संस्कार, भाव-संस्कार, क्रिया-संस्कार।

‘‘अहो कामी स्वतां पश्यति’’ (अभि. शाकु. 2.2) अर्थात् अभिलाषी व्यक्ति अपने ही अभिप्राय को देखता है। यह पहले से नहीं तय किया जाएगा कि प्रत्येक सहृदय में भाव का संस्कार समान होगा अथवा सभी सहृदय इस विशेष भाव का संस्कार, अभ्यास आदि अधिष्ठित हो। ऐसा तय करना ‘‘लिट्रेरी फासिज़्म’’ होगा। प्रत्येक सहृदय साहित्य अथवा सौन्दर्य का मूल्य स्वयं तय करेगा, वैसे ही जैसे दुष्यन्त शकुन्तला के रूप-सौन्दर्य से स्मरण में तय करता है -

चित्रे निवेश्य परिकल्पितसत्वयोगा
रूपोच्चयेन मनसा विधिना कृता नु।
स्त्रीरत्नसृष्टिपरा प्रतिभाति सा मे
धातुर्विभुत्वमनुचिन्त्य वपुश्च तस्याः।। (अभि.शाकु. 2.9)

ध्यान देने योग्य है, ‘‘स्त्री रत्न सृष्टि पर प्रतिभाति सा मे’’ अर्थात् मुझको (दुष्यन्त को) वह शकुन्तला विधाता की सुन्दर सृष्टि से भी बेहतर स्त्रीरत्न प्रतीत होती है। वह स्वतंत्र सहृदय है, उसे अपने निर्णय का अधिकार है। ध्वन्यालोककार निर्णय-आरोपण की हो रही वास्तविकता ज़्यादती से वाकिफ़ हैं, वे सहृदय को पूर्ण स्वतंत्रता देने के पक्ष में खड़े हैं। सहृदय के निजी प्रयासों के महŸव को उन्होंने कुछ इस प्रकार के रूपक से रूपायित किया है -

    आलोकार्थी भया दीपशिखायां यत्नवान् जनः।
    तदुपायतया तद्वदर्थे वाच्ये तदादृतः।।

इस बात को स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है कि प्रकाश के आकांक्षी रौशनी में दीपशिखा के प्रति प्रयत्नशील नहीं होंगे प्रत्युत यह प्रयास ही एक अनावृत्त क्षेत्र का, एक अप्रकाशित क्षेत्र का होगा। इतना स्पष्ट कथन किए जाने के बाद भी काव्यशास्त्र की चिंता करनेवालों में साहित्य के निकष के संबंध में विवाद बना रहा, यह आश्चर्य का विषय है। अस्तु! अब यह समझने का प्रयास करते हैं कि काव्य-आलोचना के निकष निर्धारण में निश्चय-अनिश्चय का प्रत्यय किसलिए उद्भावित होता है।

             एकाएक फिर स्वप्नभंग
             बिखर गए चित्र कि मैं फिर अकेला।
             मस्तिष्क हृदय में गहरे व बारीक छंदों से भर गए
             पर इन रन्ध्रों के दुःखों में गहरा
             प्रदीप्त ज्योति का रस बस गया है।
             मैं उन सपनों का खोजता हूँ आशय
             अर्थों की वेदना घिरती है मन में
             अजीब झमेला। (अंधेरे में, मुक्तिबोध)

ज़ाहिर है कि खोज जारी है, पा लेने के बाद अर्थ पुनः शब्द बन जाते हैं, पुनः अर्थ ढूँढना शेष रह जाता है और यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यह न तो पिण्टपेषण है, न रहस्यवाद। यह मानव-मनोविज्ञान की सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसमें सातत्य अनिवार्य है। कोई ठहर नहीं सकता। जो ठहर जाता है, वह जड़ है। वह दीपशिखायां यत्नवान् जनः नहीं है और जो दीपशिखा के लिए प्रयत्नशील है, वह उस अंधेरे में बार-बार प्रविष्ट होता, बार-बार अजीब झमेला आमंत्रित करता रहता है। इस अंधकार की बात विद्वत्परंपरा के उषाःकाल में भी हुई थी कि सब कुछ, यहाँ तक कि अंधकार भी अंधेरे में ढंका था (तम आसीत्तमसा गूढम्)। यह अंधकार, गहनतम अंधकार जो क्रांतद्रष्टा कवियों द्वारा सुनिश्चित किया गया, वह प्रकाश की मानवीय-सिसृक्षा का प्रस्थान-बिन्दु है। इसी कल्पित अंधकार से प्रारंभ होकर मानवीय आकांक्षा-बुद्धि के द्वारा अवकाश ढूँढने की प्रक्रिया का सूत्रपात हुआ -

         कामस्तदग्रे समवर्तनाधि मनसो ऐतः प्रथमं यदासीत्।
         सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीब्या कवयो मनीषा।।
         तिरश्चीनो विततः रश्मि....(भृ. 10.129.4.5)

अर्थात् (ऐसे विकट अंधकारमय भाव-जगत में) सबसे पहले कामना उत्पन्न हुई। (उससे प्रेरित होकर) मन का वह बीज, जो सबसे पहला था, सक्रिय हुआ। क्रान्त-द्रष्टा कवि-मनीषियों द्वारा अपनी प्रज्ञा से असत् (जो था नहीं उस) में सत् (जो उन्हें अभीप्सित था उस) को अपने ही हृदय में देखा गया। इसी (कल्पना की) किरण के द्वारा उस अंधकार को छिन्न-भिन्न कर प्रकाश फैलाया गया। ऋग्वेद का यह आख्यान उस बौद्धिक-प्रकाश का न्यायानुमोदन हैं जो वस्तु-विमर्श के बरक्स भाव-विमर्श को प्रश्रय देता है। यहाँ स्पष्टतः देखा जा सकता है कि वस्तुवाद पर ज्ञानवाद को तरज़ीह मिलता है। मनसो रेतः अर्थात् मन का बीज को कामः अर्थात् कल्पना अथवा सिसृक्षा का आधारभूत उपकरण कहा गया है। यह मन ही नाम-रूप-कर्मात्मक संसार-व्यवस्था, शब्दांतर से सामाजिकता, का अधिष्ठान है। इसके आगे आत्मन् का स्वाराज्य है - वहाँ कल्पना यानी मानवीय सिसृक्षा निःशेष है, जो किसी भी सामाजिकता का सैद्धांतिक निषेध है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी रस की गति, प्रकारान्तर से साहित्य की गति इस मनोमयकोश तक ही व्याप्त मानते हैं, साथ ही मन को अनिवार्य भी मानते हैं, व्यापक भी, ‘‘यही बाहर हंसता-खेलता, रोता-गाता, खिलता-मुरझाता जगत् भीतर भी है, जिसे हम मन कहते हैं। जिस प्रकार जगत रूपमय और गतिमय है, उसी प्रकार मन भी।’’ (रस मीमांसा) लेकिन क्या यह मन विशेष दशा में अनुकूलित है? कुछ आधुनिक चिंतकों ने पाश्चात्य चिंतन से संवाद बनाने के प्रयोजन से उक्त मन की मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने का विशद् प्रयास किया है जिससे प्रतीत होता है कि मनुष्य एक इमोशनल एनिमल है। किन्तु वास्तविक स्थिति यह नहीं है, मन की विविधता और परिवर्तन-योग्यता इस मान्यता का प्रतिषेध करती है। इसके अतिरिक्त यहाँ यह स्पष्ट करना प्रासंगिक है कि सर्जना के पक्ष में, जिसमें रचना और पाठ दोनों सम्मिलित है, मन और काम (कल्पना और सिसृक्षा) का समन्वय ही अनिवार्य है। अन्य पुरूषार्थ, धर्म, अर्थ या मोक्ष काम के मुल्लमे के साथ ही काव्य में प्रवेश पाते हैं। साहित्य से चतुर्वर्ग की प्राप्ति का उपन्यास करना, निरर्थक और निरास्पद है। सनद् रहे, काम न तो रति-मात्र है, न ही स्वच्छंदतावाद। मन की संकल्पना को लेकर भी पर्याप्त भ्रांति रही है।

भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों में मन, आत्मा आदि अवधारणाओं को स्वीकारा भी गया है, महत्त्वपूर्ण भी माना गया है। तथापि इनके स्वीकार और महŸव में गहरा और कोटिपरक भेद रहा है। कहीं तो मन, आत्मा आदि व्यक्ति के सहायक उपकरण माने गए हैं तो कहीं संसार का आधार और स्वारस्य का अधिष्ठान। भारतीय परम्परा मात्र कह देने से एक विभीषण-भ्रांति व्याप्त हो जाती है जो काव्य-शास्त्रीय पठन-पाठन पर अद्यतन प्रभावी है। इस भ्रांति का लाभ भी चतुर-शास्त्रियों ने खूब उठाया है।

निवेदन किया जा चुका है कि भारतीय दर्शन की दो मुख्य धाराऐं हैं। इन्हें वस्तुवादी और ज्ञानवादी कहा जा सकता है। प्रथमधारा के प्रतिनिधिवादी न्याय दर्शन है जिनकी सहायता के लिए वैशेषिक मन भी एकतंत्र हो जाता है। इस तरह न्याय-वैशेषिक की समझ कथित रूप से दो और दो चार की भाँति परिस्पष्ट है। वे अपनी समझ में निष्कण्टक और निर्द्वन्द्व है, किसी भी संदेहास्पद स्थिति का दूध का दूध और पानी का पानी मानसरोवर के हंस की भाँति कर देते हैं। न्याय सूत्रकार ने बताया है कि सोलह पदार्थ हैं, जिन्हें एक शिण्य को जानना चाहिए। जबकि वैशेषिक सूत्रकार ने मात्र छः पदार्थ बताए हैं। ध्यान देने योग्य है कि मात्र इतने पदार्थ हैं, शेष या तो हैं नहीं अथवा अ-पदार्थ हैं। मन, आत्मा, रस, राग आदि जो भी साहित्य-शास्त्र में हिलोरे मार रहे हैं, वे सभी यहाँ अवान्तर भेदों में कहीं सुदूर सन्निविष्ट हैं। जीव या मनुष्य को यद्यपि विवेचना का विषय नहीं समझा गया है तथापि जीवात्मा को एक द्रव्य विशेष आत्मा के प्रकरण में नोटिस किया गया है। फिर भी, चाहे जीवात्मा हो या परमात्मा, इनकी आत्मा को कम्प्लीट इन्टीटी के रूप में स्वीकृत नहीं किया गया है। मैसूर हिरियन्ना न्याय-वैशेषिक आत्मा के विषय में अपनी समीक्षा कुछ इस प्रकार रखते हैं -

‘‘ये अनेक हैं और प्रत्येक को सर्वव्यापी और नित्य माना गया है।...आत्मा के भाव, विचार और संकल्प केवल उस भौतिक शरीर तक सीमित होते हैं जिससे उनका उनकी उत्पत्ति के समय सम्बन्ध होता है।...ज्ञान आत्मा का गुण है, वह भी आवश्यक नहीं बल्कि आगन्तुक मात्र हैं।...इस प्रकार आत्मा का जड़ द्रव्य से अन्तर केवल इस बात में है कि वह चैतन्य से मुक्त हो सकता है।...दो अन्य गुण इच्छा और यत्न भी लगभग इसी तरह आगंतुक माने गए हैं। इस दर्शन में असली अजड़ तत्व आत्मा नहीं बल्कि ये तीन गुण हैं, जो सब अनित्य है। हमें अपनी आत्मा का अव्यवहित ज्ञान होता है लेकिन अन्य आत्माओं का ज्ञान केवल व्यवहित रूप में उनके व्यवहार इत्यादि से हो सकता है।’’ (पृ0 229.30,

भारतीय दर्शन की रूप-रेखा) अब विचार करने की आवश्यकता है कि इस वस्तुवादी-बाह्यार्थवादी दृष्टिकोण से ठोस आधार की योजना करने वाले यदि रसध्वनि को काव्य की आत्मा मानते भी होंगे तो उस आत्मा की गंभीरता और व्याप्ति कितनी होंगी?

यहीं मन के प्रति क्या धारणा है, यह भी हिरियन्ना के ही शब्दों में देखते हैं, ‘‘यह अणु और नित्य है। प्रत्येक आत्मा का अपना-अपना मनस् होता है। यह ज्ञान का एकमात्र साधन है और इसलिए अन्य इंद्रियों की तरह जड़ है। ज्ञान चाहे बाह्य वस्तुओं का हो, चाहे आंतरिक अवस्थाओं का, उसकी उत्पत्ति के लिए मनस् एक अनिवार्य सहायक कारण है।...मनस् के द्वारा ही आत्मा का इन्द्रिय और शरीर से सम्बन्ध स्थापित होता है और उसके द्वारा ही उसका बाह्य जगत से सम्बन्ध होता है।’’ (वही, पृ0.230) यहाँ मन के वास्तविक स्वरूप को समझकर इस बात का प्रतिषेध आवश्यक है कि रामचन्द्र शुक्ल का मन इस वस्तुवादी उपकरण मन से नितान्त रूप से भिन्न और व्यापक है। फिर न्याय-वैशेषिक ने अपने चौबीस गुणों में राग को स्थान नहीं दिया, खींचतान कर ढूंढा जा सकता है। रस को मात्र रसना स्वाद के रूप में वर्गीकृत किया है। इस वस्तुवादी दर्शन की प्रविधि में एकबात स्पष्ट है कि यहाँ अपने अलावा सबको शिष्य मानकर चलने की परिपाटी है। अध्यायों का नाम आह्निक इस बात का साक्ष्य है। इन्हें जन को शिक्षित करना अभिप्रेत है। आचार्य का मत शंका-योग्य नहीं होता, आचार्य किसी शिष्य को शंका-समाधान या जिज्ञासा में शामिल नहीं करते। यहाँ वस्तु-स्थितियों की क्रिस्टलीय समझ होती है।

गौरतलब है कि यह प्रविधि ज्ञानाधीशों के हितों की सैद्धांतिक रूप से सुरक्षा करती है। फलतः इस प्रकार की सुरक्षित-प्रविधि की परम्परा अद्यतन व्यवह्न्यिमाण है। इसी परम्परा के बल से असुन्दर को सुन्दर कह देने की भीति और काव्य-निर्णय के लिए ठोस आधार की आकांक्षा बरकरार है। इनकार नहीं किया जा सकता कि न्याय-वैशेषिक की परम्परा आज भी व्यापक और बौद्धिक क्षेत्र में बहुमान्य है, इसके अपने निहित प्रयोजन है। उपर्युक्त भीति और आकांक्षा वाले विदग्ध दावेदारों में विद्यमान होने के बावजूद इस प्रविधि की जन-मन-संगत नहीं मानी जाएगी। अब यह माना जाना अधिक युग-संगत है कि ज्ञान-विज्ञान सत्ता-अनुकूलन का उपकरण नहीं, बौद्धिक लोकतंत्र का नुस्खा भी है। इस प्रक्रिया में आम जनता का शामिल होना साहित्य के गतिमान और अस्तित्ववान बने रहने के लिए आवश्यक है। इसके लिए हर तरह के लोगों को सहृदय माना जाना भी संगत है तो प्रत्येक कोटि के सहृदय के निर्णय को सानी देना भी संगत है। इस प्रक्रिया को अबाध जिज्ञासा की अनवरत प्रक्रिया बनाना संगत भी है, युगाकांक्षा भी। पूरी तरह से मुक्त, अथातो ब्रह्म जिज्ञासा की तरह।

वेदान्त शास्त्र के इस सूत्र की मुक्तता का भान तब होता है जब प्रथम वैशेषिक-सूत्र ‘‘अथातोधर्मव्याख्यास्यामः’’ देखते हैं। यहाँ व्याख्या की दरकार है, वहाँ जिज्ञासा की। व्याख्या विशेषज्ञ ही करेंगे, शिण्ट ही करेंगे किन्तु जिज्ञासा कोई भी कर सकेगा (यद्यपि औपचारिक प्रतिबंध लगाए गए हैं जिन्हें मौलिक और अनिवार्य नहीं माना जा सकता)। क्योंकि जिज्ञासा आत्म-निर्णय है। जिज्ञासु अपनी बुद्धि, रूचि, बोध इत्यादि की अपनी विशेषवर्गीय अपनी जिज्ञासा का वितान फैलाएगा। इस बात की छूट उपनिषत्साहित्य भी देता है। वहाँ संवाद-विधि की प्रचुरता है। सभी सोचेंगे, विचार करेंगे, वैचारिक खुलापन रहेगा। उपनिषद् एक चिन्तन-प्रविधि है। शूद्र और स्त्री भी चिन्तन में ब्राह्मण, क्षत्रियों साथ शामिल हैं। वहाँ वैचारिक विश्रृंखलता अनायास ही दीख पड़ती है, जो शास्त्रीय अपरिपक्वता नहीं विचार-सहिष्णुता है। हालाँकि बाद के आलोचकों द्वारा शास्त्रीयता का आरोप भी किया गया किन्तु मूल-प्रविधि को छिन्न-भिन्न न किया जा सका। उस वेदान्तशास्त्र की मेल-प्रविधि यही है कि प्रत्येक चेतन व्याप्ति अपनी आत्मा के प्रति जिज्ञासा रखे और लोग रखते भी हैं। विषय-विषयी के अपरोक्ष सम्बन्ध का पक्षधर वेदान्त ऐन्द्रिकता तक को प्रतिबन्धक मानता है। तो भला इस चेतना से संचालित व्यक्ति किसी पूर्वानुमोदित परिपाटी, किसी ठोस आधार के नियमन को क्यों स्वीकार करेगा। काव्य-निर्णय, सौन्दर्य-निर्णय में चेतना की उन्मुक्तता तो प्रश्रय नहीं मिलना चाहिए क्या!

भारतीय काव्य-मीमांसा की परिपाटी में आत्मा, मन, रस, (रागात्मिका वृत्ति), वगैरह की भूयशः आवृत्ति मिलती है। इससे भी अधिक इस बात का प्रश्रय मिलता है कि काव्य-व्यापार प्रथमतः और अन्ततः भाषा-व्यापार की ही एक विशेष कोटि है। भाषा सामाजिक वस्तु है क्योंकि इसके अभिलक्षणों में संप्रेषणीयता को अनिवार्य माना गया है। इन बातों के मद्देनज़र यह कहा जा सकता है कि अद्वैत मत ही एक चिन्तन-पटल है जहाँ ये सभी पक्ष अपनी निःशेष व्याप्ति को प्राप्त होते हैं। यहाँ आत्मा व्यक्तित्व का आधारभूत सर्वस्व माना गया है। इसी के आश्रय में अन्य पक्ष प्रतिष्ठित हो पाते हैं। आत्मा व्यक्तित्व का हिस्सा न होकर केन्द्रीय आधार होता है।

काव्य पक्ष में यदि रस-विमर्श करते हुए इस बात का ख्याल रखा जाना इस बात का इंगित है कि जो प्रत्यक्षगत है, वह आत्मा नहीं और जब काव्य का मूल उत्स पकड़ में आ जाता है तो अन्य पक्ष स्वतः ही गौण हो जाऐंगे, गंतव्य को प्राप्त लंगड़े की लाठी की मानिंद। यहाँ अभिप्रेत है कि काव्य का शब्दार्थ शरीर आस्वाद्य है जो रस-आस्वाद का उद्बोधक रूप सहायक कारण है। रस यानी काव्य की आत्मा तक पहुँचने का साधन शब्दार्थ है। किन्तु इसकी साधनता सिद्ध होती है सहृदयों के संतोष में। प्रत्येक कवि अपने भरसक उत्तम काव्य ही करते हैं किन्तु कालिदास जैसे कवियों के लिए भी, ‘‘आपरितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्’’ अर्थात् सहृदयों के परितुष्ट होने तक प्रयोग विज्ञान को बेहतर नहीं माना जा सकता। यदि सहृदय संतुष्ट है तो कविता पूरी हो गई। कविता की शब्द-योजना में इतनी शक्ति तो अपेक्षित है कि सहृदयों की उनकी अनादिवासना (सामूहिक अवचेतन) से संवादिता उस परिपे्रक्ष्य में स्थापित कर दे। यह प्रकार्य जितनी सहजता और जितने प्रकार के सहृदयों के लिए सम्पन्न होता है, उतनी श्रेष्ठ कविता मानी जाएगी। यह ठीक है कि कविता प्रत्यक्ष में शब्द-योजना मात्र होती है, किन्तु शब्दार्थता इतनी भी महत्त्वपूर्ण नहीं होती कि उसे अतिरिक्त बल मिले।

सहृदय कौन है? एतद्विषयक जिज्ञासा के क्रम में प्राप्त होता है, ‘‘यैषां काव्यानुशीलनाभ्यासवशात् विशदिभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मार्यीवनयोग्यता, तत्र हृदयसंवादभजः सहृदयः।’’ अर्थात् कविता के बार-बार अनुशीलन (पाठ) करने में जिनके निष्कलुष हो गए अन्तःकरण में वर्णनीय वस्तु से तन्मय होने की योग्यता हो, साथ ही अंतःकरण से संवाद करने की (अतिरिक्त) योग्यता भी हो, वह सहृदय है। उक्त कथन से तत्र हृदयसंवादभजः को हटा दिया जाता है तो इसमें आभिजात्य प्रसंग आ जाता है। इसे समीचीन नहीं माना जा सकता है। यदि भाषा की समाज-निष्ठा निरपेक्ष है तो फिर कविता ही क्यों नहीं? इसके लिए किसी प्रकार का विद्वत्-क्षेत्र निर्मित नहीं किया जा सकता। ध्यान रखना अपेक्षित है -

              ‘‘जनता को ढोर समझ
               ढोरों की पीठ भरे
               घावों में चोंच मार
               रक्त भोज, माँस भोज
               करते दुष्ट गर्दन मटकाते हुए दर्प-भर कौओं-सा
               भूखी अस्थि पंजर शेष
               नित्य मार खाती सी
               रंभाती हुई अकुलाती दर्द भरी
               दीन मलिन गौओं सा
                      शब्दों का अर्थ जब। (मुक्तिबोध)

विद्वन्निष्ठामूलक मनमानी के कारण ही, अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के नायक दुष्यन्त की स्त्री-लोलुपता के कारण उसके बहुगामी होने का कथन (विदूषक के मुख से) किया गया किन्तु उसे चर्चा में नहीं लाया गया। कथन कुछ इस प्रकार है, ‘‘यथा कस्यापि पिण्ड खर्जू रैरू द्वेजितभ्य तित्रिण्यामयिलाषो भवेत्तथा स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवतः इयमभ्यर्थना।’’(2.8  के बाद) भावार्थ कुछ इस प्रकार है, आप तो उत्तम कोटि की नागर स्त्रियों का भोग करनेवाले हैं, आज इस वनवासिनी पर लुब्ध हो रहे हैं। यह तो कुछ ऐसा ही हुआ कि सुस्वादु, सुमधुर पिण्ड खजूर खा-खा कर छका हुआ मनुष्य बनैली इमली खाने की अभिलाषा करे। कवि ने अपना काम तो किया किन्तु विद्वान सहृदयों का यह सरस लगा या नहीं, पता नहीं। यदि इस कथन को महत्त्व मिलता तो प्रसंग बनता बहुपत्नी होने की उनींदी में दुष्यंत ने अपनी मातृ-पितृ-विहीना प्रेमिका-पत्नी शकुन्तला को विस्मृत कर दिया। ऐसा पाठ क्यों नहीं बनता? प्रसंग बनता है दुर्वासा का श्राप क्यों? जबकि यह उपचार मात्र है। ऐसा इसलिए क्योंकि सुरूचि-सम्पन्न सहृदयों के हृदय में यह स्थान नहीं बना पाता। ऐसा इसलिए भी क्योंकि किसी मुक्त स्त्री चेतना ने इसका पाठ नहीं तैयार किया। सबकुछ निर्विकार रूप से, सहृदय यानी पाठकर्ता पर ही निर्भर करता है। अ सर्च फॉर डिफरेन्स अपरिहार्य है, इसकी ज़रूरत है।

अब किंचित चर्चा मनोमय संसार का। मन वह नहीं जो न्याय-वैशेषिक के अनुसार, निर्विकल्प संवेदनाओं का वाहक मात्र है। इसे इतना ही विशिष्ट और पर-मुखापेक्षी मान लिया जाएगा तो कविता सामाजिक वस्तु न होकर एक इन्द्रिय-प्रत्यक्ष योग्य विषय मात्र बनकर रह जाएगी। और ऐसा बहुतेरे काव्यप्रेमियों के दृष्टांत में देखा भी जाता है। किन्तु इस योजना को मान्य नहीं किया जा सकता है। मन कोई मनोवैज्ञानिक पुर्जा नहीं, वेदांत शास्त्र इसे संसार, समसामयिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिकता का व्यक्तिगत अधिष्ठान बताता है। मन एक जटिल निर्मिति है, सामूहिक अवचेतन द्वारा व्यवस्थित और अनुकूलित तथा आत्माभिमान द्वारा संचरित। मन-मन के निर्माण में फर्क हो सकता है, बल्कि होता भी है। ‘‘तोरा मोरा मनवा कैसे एक होई रे।’’ और फिर, साहित्य का (व्यंजना) व्यापार मनोवृत्ति पर आकर समाप्त नहीं होता। यह प्रक्रिया व्यक्ति-मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया न होकर समाज-निजता का प्रसंग होता है। यद्यपि कवि भी व्यक्ति है, सहृदय भी व्यक्ति है किन्तु दोनों की चेतना सामाजिकता से सक्रिय रूप से जुड़ी होती है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से सिर्फ आदान-प्रदान के लिए ही नहीं सम्बद्ध होता प्रत्युत सामाजिक चेतना के सूत्र से भी संबद्ध होता है। इसलिए काव्य-विमर्श को मनोवृत्ति की बन्द वृत्त से बाहर निकालना अपेक्षित है। यह मानसिकता के वृत्त में घटित होने वाली संघटना है, क्योंकि यह सिर्फ गुदगुदाने का मनोरंजक साधन नहीं, कुछ और भी है। अतएव, मन से संबंधित दार्शनिक पहलू पर एक दृष्टिपात किया जाता है।

भारतीय शास्त्रीय परम्परा आत्मा को मन से अतीत सत्ता मानती है, जबकि आचार्य शंकर मन की संरचना को अंतःकरण के रूप में निरूपित करते हैं। मन के सभी प्रकार्य को आत्मा प्रकाशित भर कर देती है, यथार्थ निर्णय को भी, अयथार्थ निर्णय को भी। मन पर आत्मा का कोई प्रकार्यात्मक नियंत्रण नहीं होता। इस मन के निर्णय हमेशा नाम-रूप-कर्म की कोटि में होते हैं। इन्हीं से संसार का निर्वाह होता है। यहाँ मन की व्यापकता पर ध्यान देना होगा। किन्तु नाम-रूप-कर्म की भाव-जगत में निरपेक्ष सत्ता स्वीकृत नहीं की जा सकती। मसलन, एक मिट्टी का घड़ा है - किसी को इसमें घटत्व दिखता है, किसी को मिट्टी, तो किसी को घड़े का सुघड़पन। किसी के अवलोकन को अतथ्य नहीं कहा जा सकता है, किन्तु नितांत भिन्न है। वस्तु-स्थिति के एक होने पर उसके अवलोकन में दृष्टिभेद संभावित भी है, संगत भी। जैसे, रस्सी में सांप वाला प्रसिद्ध दृष्टांत। यह अनिवार्य नहीं है कि सबको रस्सी में सांप होने का भ्रम हो। सभी सांप से डरते ही हों, यह भी अनिवार्य नहीं है। इस प्रकार प्रत्येक विषय के प्रतिबोध में व्यक्ति के भेद से निर्णय-भेद स्वीकार्य हैं। इन भिन्नताओं के मूल में व्यक्ति की मानसिक-संरचना की आधार-भूत निर्मिति है। किसी भी समाज में सभी दो भाइयों का सम्बन्ध एक जैसा ही नहीं होता। समाज व्यवस्था इन्हीं अनेकतामूलक प्राक्कल्पनाओं पर आधारित होती है। इसमें परिर्वतन की पूरी संभावना होती है। किसी प्रकार के अनिवार्य सत्य को किसी निश्चित रूप में साग्रह स्वीकार कर लेने पर समाज-व्यवहार-प्रबंधन में कठिनाई आ सकती है, आ जाती है।   

इस दार्शनिक अन्विति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सहृदय व्यक्ति रूप में एक विशेष (वर्गीय) मानसिक संरचना से नियमित मानसिकता के साथ ही काव्य से संबंध बनाता है। व्यक्ति की मानसिकता उसकी सीमा भी है, तो वही उसकी योग्यता भी, स्वतंत्रता भी। अतएव काव्य-निर्णय के प्रसंग में सहृदय की मानसिकता आत्यन्तिक रूप में महŸवपूर्ण है। मनोवृत्ति और मानसिकता में भी फर्क है (यह फर्क योगशास्त्र और वेदांत शास्त्र का है)। मनोवृत्ति अत्यंत व्यक्तिनिष्ठ एवं यांत्रिक होने की ध्वनि देती है, सामाजिक भागीदारी इस पद से ध्वनित नहीं होती। स्मरणीय है, ‘‘ हृदयसंवादभजः’’। हृदय वृत्तिमात्र नहीं है। यह मानसिकता का अर्थ-कथन है। मानसिकता एक पद है जिसमें व्यक्ति के निज-वर्गीय और सार्वजनिक दोनों संस्कार अर्थात् उसकी सामाजिक चेतना अनुस्यूत होती है। वह सहृदय अपनी सामाजिक सत्ता के साथ काव्य का आस्वाद (पाठ) करता है, यद्यपि होता वह व्यक्ति विशेष ही है। और फिर, यदि काव्य आभिजात्य-व्यापार मात्र नहीं है, सामाजिक कार्य है तो हर तरह के सहृदयों के निर्णयों को अन्तिम निर्णय मानना होगा, भले ही वह असुन्दर उक्ति में सौन्दर्य देखे अथवा किसी ठोस आधार का अनुपालन करे या न करे। इससे काव्य-निर्णय की एकरूपता टूट सकती है, काव्य-निर्णयों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसका कारण यह है कि कविता भाषा की वस्तु है, भाषा समाज की वस्तु है और समाज सामाजिकों की समाज-चेतना/मानसिकता में अधिष्ठित है।

अब, जहाँ तक रस निर्णय का संबंध है तो नामवर सिंह इसे कुछ इस प्रकार से व्यवस्थित करते हैं, ‘‘रस-निर्णय अंततः अर्थ-निर्णय पर निर्भर है। अर्थ-निर्णय पाठक की कोटि अनुभूति का विषय नहीं, बल्कि प्रस्तुत काव्य के सूक्ष्म विश्लेषण से सम्बद्ध है।...यदि विश्लेषण के लिए यथेष्ट धैर्य हो तो काव्य में अर्थगत संभावना अनंत है और कोई भी विश्लेषण अर्थ को निःशेष करने में समर्थ नहीं है।’’ (पृ0.49, कविता के नए प्रतिमान) स्पष्ट करने की अधिक आवश्यकता नहीं है कि सूक्ष्म-विश्लेषण के लिए जड़बद्ध मनोवृत्ति पर्याप्त नहीं, उदार और नूतन मानसिकताओं का हस्तक्षेप अपेक्षित है। इन्हीं के द्वारा प्रसिद्धावयवातिरिक्त खोले जा सकेंगे, उनके द्वारा नहीं जो ‘‘वाच्यवाचकलक्षणमात्रकृतश्रम’’ हैं। यह काव्य की गतिमयता और अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है। ऐसा सहृदय के महŸव की ठीक-ठीक और समसामयिक पहचान से संभव है। यद्यपि पाठक की कोरी अनुभूति के निषेध में उच्चस्तरीय पाठक की संभावना (आलोचक की स्थापना) का समावेश प्रतीत होता है, किन्तु इस संभावना को प्रतिनिधित्व के आशय में ग्रहण करना समयानुकूल है।

अन्त में, काव्य के अधिकारी का पुनः सम्यक् रूप से निर्धारण प्रसंगवश आवश्यक प्रतीत हो रहा है। अधिकारी तब भी वर्गीकृत श्रोता-पाठक ही थे, अधिकारी अब भी वर्गीकृत श्रोता-पाठक ही है। किन्तु उस समय संभवतः, कोई एक वर्ग था, आज उसके अनेक वर्ग हैं। सबके अपने-अपने विशिष्ट चेतना संस्कार हैं, जो एक साथ, एक समय में किसी प्रस्तुत काव्य के पाठ से अलग-अलग रूपों में प्रस्फुटित हो रहे हैं। ये सभी यद्यपि अर्थ मीमांसा के एक ही मूल आधार से गुज़रते हैं तथापि कविता के प्रसंग में, जो कि भाषागत प्रकार्य है, शब्दार्थ के विवेचन-विश्लेषण को अधिक बल मिलने से प्रतीयमान पक्ष कमजोर होता है। कविता कथन होने लगती है। शब्दार्थ एक अनुशासन है, व्यवस्था है, जबकि काव्यार्थ इस अनुशासन में रहते हुए एक विशिष्ट स्वायत्तता का दृष्टांत होता है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि शास्त्र की, विमर्श की भी मर्यादा होती है, सीमा होती है। यह कहने की बात नहीं, -

             ‘‘या विधवा की
             कोख से अवैध समझा गया जन्म
             जब सत्यों का होता है।’’ (मुक्तिबोध)

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डॉ० रवीन्द्र कुमार दास
( साभार )





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