*** शमशेर: जीवन ही संदेश

सहजता अगर मनुष्य का गुण है तो शमशेर बहादुर सिंह का जीवन और काव्य उसका उदाहरण है। न औपचारिकता, न पाखंड। जैसा जीवन, वैसा लेखन। उनके अनुभव का सूत्र पकड में आ जाये तो दुरूह जान पडने वाली कविता भी खुल जाती है। लेकिन वे मानते थे, कला कलेंडर की चीज नहीं। इसलिए अपने अनुभव का निजीपन, जहां तक हो सके, उसे खुलने से रोकते थे। फिर भी सहज थे, सरल नहीं। सरलता तो कभी-कभी नासमझी से भरी होती है। सहजता जीवन का ताप सहकर आती है। कबीर उसे सहज साधना कहते थे। शमशेर को भी साधना से ही सहजता प्राप्त हुई है। अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हुए शमशेर ने लिखा था-
भूल कर जब राह- जब-जब राह.. भटका मैं
तुम्हीं झलके हे महाकवि,
सघन तम की आंख बन मेरे लिए।
घने अंधेरे में शमशेर के लिए आंख बन निराला इसलिए झलके कि दोनों का जीवन साम्य लिये हुए था। एक जैसा आर्थिक और भावात्मक अभाव। बचपन में मां की मृत्यु, युवाकाल में पत्नी की मृत्यु, अनियमित रोजगार और अकेलापन। देर से ही सही, उन्हें बडे-बडे पुरस्कार भी मिले- साहित्य अकादमी (1977), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार (1987), कबीर सम्मान (1989)।



शमशेर का जन्म तारीफ सिंह के पुत्र के रूप में 3 जनवरी 1911 को देहरादून में हुआ। मृत्यु 12 मई 1993 को अहमदाबाद में। देहरादून ननिहाल था। अहमदाबाद उनपर शोधकर्ती रजना अरगडे का निवास, जो अब वहीं प्रोफेसर और विदुषी हैं। शमशेर के भाई तेज बहादुर उनसे दो साल छोटे थे। उनकी मां परम देवी दोनों भाइयों को राम-लक्ष्मण की जोडी कहती थीं। शमशेर 8-9 साल के थे जब वे संसार छोड गयीं। लेकिन यह जोडी शमशेर की मृत्यु तक बनी रही।



शमशेर चौबीस वर्ष के थे जब उनकी पत्नी धर्मवती छ: वर्ष के साथ के बाद 1935 में टीबी से दिवंगत हुई। जीवन का यह अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा। काल ने जिसे छीन लिया, उसे अपनी कविता में सजीव रखकर शमशेर काल से होड लेते रहे।



युवाकाल में शमशेर वामपंथी विचारधारा और प्रगतिशील साहित्य से प्रभावित हुए। शमशेर का अपना जीवन निम्नमध्यवर्गी का औसत जीवन था। शायद कुछ अधिक निम्न। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी निजी चीज की तरह अपनाया। इंद्रिय-सौंदर्य के सबसे संवेदनापूर्ण चित्र देकर भी वे अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं हैं। उनमें एक ऐसा कडियलपन है जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता, साथ ही किसी एक चौखटे में बंधने भी नहीं देता। वे खुद मानते हैं कि इलियट-एजरा पाउंड-उर्दू दरबारी कविता का रुग्ण प्रभाव उनपर है, लेकिन उनका स्वस्थ सौंदर्यबोध इस प्रभाव से ग्रस्त नहीं है। वे सौंदर्य के अनूठे चित्रों से स्त्रष्टा के रूप में हिंदी में सर्वमान्य हैं-
1. मोटी धुली लॉन की दूब,
साफ मखमल-सी कालीन।
ठंडी धुली सुनहली धूप।
2. बादलों के मौन गेरू-पंख, संन्यासी, खुले हैं
श्याम पथ पर
स्थिर हुए-से, चल।
शमशेर के राग-विराग गहरे और स्थायी थे। अवसरवादी ढंग से विचारों को अपनाना-छोडना उनका काम नहीं था। अपने मित्र-कवि केदारनाथ अग्रवाल की तरह शमशेर एक तरफ यौवन की उमडती यमुनाएं अनुभव कर सकते थे, दूसरी तरफ लहू भरे गवालियर के बाजार में जुलूस भी देख सकते थे। उनके लिए निजता और सामाजिकता में अलगाव और विरोध नहीं था, बल्कि दोनों एक ही अस्तित्व के दो छोर थे। नाहक ही टूटी हुई, बिखरी हुई उनकी प्रतिनिधि कविता नहीं मानी जाती। उनमें शमशेर ने लिखा है-
दोपहर बाद की धूप-छांह में खडी इंतजार की ठेलेगाडियां
जैसे मेरी पसलियां..
खाली बोरे सूजों से रफू किये जा रहे हैं.. जो
मेरी आंखों का सूनापन है।
इंतजार की ठेलेगाडियां ही मानो पसलियां हैं और खाली बोरे से आंखों का सूनापन। ठहराव, अभाव और व्यर्थता परिवेश में है, जीवन में भी।



ज्यादातर समकालीन कवियों का इतिहास-बोध 20-25 साल या 50-60 साल से पीछे नहीं जाता। अपनी चर्चा के अलावा कुछ और नहीं भाता। लेकिन चिंतन में ही नहीं, सृजन में भी इतिहास का जितना गहरा बोध होता है, कवि उतना ही विशिष्ट और महत्वपूर्ण होता है। साथ ही, अपने समय को ज्यादा गहराई से समझने में सक्षम भी होता है।



शमशेर उन कवियों में थे, जिनके लिए मा‌र्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था। प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे- भोर के नभ को नीले शंख की तरह वही देख सकता है जो भारतीय परंपरा से ओत-प्रोत है। शमशेर सूर्योदय से डरने वालों में नहीं हैं, न सूर्यास्त से कतराने वालों में हैं। वैदिक कवियों की तरह वे प्रकृति की लीला को पूरी तन्मयता से अपनाते हैं-
1. जागरण की चेतना से मैं नहा उट्ठा।
सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता।
2. सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता
केश-तन में झिलमिला कर डूब जाता..
जागरण का सूर्य हो या डूबने का सूर्य, शमशेर दोनों को अपनी पुतलियों में स्नान कराते हैं। उनमें ही यह क्षमता हो सकती थी कि अपने को हिंदी और उर्दू का दोआब कहकर सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में सांप्रदायिकता को निरस्त करें; वे ही रूढ़िवाद-जातिवाद का उपहास करते हुए कह सकते थे, क्या गुरुजी मनु ऽ जी को ले आयेंगे? हो गये जिनको लाखों जनम गुम हुए। यह सहज बेबाकी इसलिए है कि-
मुझे बादशाहत नहीं चाहिए
मगर तू ही कुल मेरी दुनिया है क्यों।


नम्रता और दृढता, फाकामस्ती और आत्मविश्वास से बना शमशेर का कवि-व्यक्तित्व अपनी पूरी गरिमा के साथ हमारे बीच मौजूद है। जन्मशती के मौके पर उनके इन गुणों को पहचानना, याद करना, और हो सके तो अपनाना, केवल श्रद्धांजलि नहीं है, अपना संस्कार भी है।



प्रो. अजय तिवारी   रचित साभार

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