रचनाकार की दृष्टि यदि उनकी रचनाओं में समाहित हो तो रचनाकार का व्यक्तित्व व उनकी विशेषताओं को उजागर करने के लिए रचना से परे कम ही भटकना पड़ता है. तुलसीदास को 'लोकवादी' का विशेषण देने के लिए डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पुस्तक 'लोकवादी तुलसीदास' में उनकी रचनाओं को ही आधार बनाते हैं और यथेष्ट विवरण एवं उद्धरण से तुलसी की लोकवादिता को प्रस्तुत करते हैं. इसी क्रम में उन बिन्दुओं को भी बेहिचक रेखांकित करते हैं जहाँ तुलसी की लोकवादिता खंडित होती है. लेकिन इस खंडन के कारण पुस्तक का नाम त्रिपाठी जी नहीं बदलते. पुस्तक का नाम ध्येय-सापेक्ष होता है और इस पुस्तक के नाम से उनका ध्येय स्पष्ट हो जाता है.
तुलसीदास को विषय बनाना इतिहास और परंपरा में सप्रयोजन प्रवेश करना है. प्रयोजन वर्तमान से सम्बद्ध ही नहीं अतीत से विशेष लगाव का भी हो सकता है. इतिहास और परम्परा के प्रति विशेष लगाव का मतलब आँख मूंदकर गले लगाना नहीं बल्कि अपनी रचना-दृष्टि और उद्देश्य के अनुरूप परंपरा का साक्षात्कार करना है. 'लोकवादी तुलसीदास' इसी तरह का साक्षात्कार है. डॉ. त्रिपाठी ने इसे चार अध्यायों में विभक्त किया है. प्रथम अध्याय 'तुलसी के राम' में तुलसी के अधीष्ट 'राम के रामत्व' को अन्य रचनाओं के राम से पृथक करते हुए उसकी विशिष्टता को सामने लाते हैं. उन्होंने लिखा कि वाल्मीकि, भवभूति, तुलसी और निराला के 'रामों' में जो अंतर है उसका कारण इन महाकवियों के युगबोध का अंतर है. एक ही धरातल पर समानता दिखती है और वह है केवल राम का संघर्ष. (पृ० २५) तुलसीदास ने राम के जीवन की अविरल संघर्ष-परंपरा को स्वीकार कर उनके चरित्र को अपनी रचनाओं में पुनः स्थापित करने के स्थान पर अपने युग के नायक के रूप में चित्रित किया. यह नायक तुलसी के दर्शन और चिंतन में तो ब्रह्म है लेकिन उनकी कविता में लोकनायक है. राम के रामत्व के साथ नायक का नायकत्व भी पृथक हो जाता है. राम-नाम की महिमा गाते समय तुलसी निस्सम्बल, असहाय, अभागे, गुणहीन, गरीब, दीन, अकुलीन, पंगु, अंधे, भूखे आदि जन को याद करते हैं. इन्हीं दीन जनों के बंधु हैं तुलसी के लोकनायक. तुलसी भक्त-कवि हैं लेकिन उनके भक्ति और उनके राम में इस लोक की पूरी समाई है. डॉ. त्रिपाठी ने इन्हीं संदर्भो में राम को 'मानव इतिहास के संघर्षशील व्यक्ति' का और सहायक बन्दर भालू को 'सर्वहारा का प्रतीक' बना सकने की बात रखते हुए लिखा - "जो लोग राम कथा के इन प्रतीकों को नहीं समझते, वे सचमुच अधिकारी हैं तुलसी को सामंती व्यवस्था का पोषक और संकीर्णतावादी कहने को." (पृ०-२५)

