*** भूमंडलीकरण और राष्ट्रवाद


मंडलीकरण उत्तर-आधुनिक अवधारणा है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व की कल्पना 'विश्व-ग्राम' या 'ग्लोबल विलेज' के रूप में की जा रही है। भूमंडलीकरण वास्तव में पूंजीवाद की अत्यंत नवीन स्थिति है (या रूप है)। सोवियत संघ के पतन के बाद अब केवल एक व्यवस्था बची है जो विकसित पूंजीवादी देशों के द्वारा नियंत्रित वित्तीय संजालों तथा पण्यवस्तुओं के बाजारों की व्यवस्था है। अर्थात् 'अब न तो ऐसा कोई वास्तविक आर्थिक क्षेत्र बचा है जो नव-उदारवादी पूंजी के प्रभुत्व से बचा हो और न कोई ऐसा ध्रुव बचा है जिसकी ओर निर्धनतर देश झुक सकें।1 अब निर्धन देशों के पास बेहतर तकनीक एवं श्रेष्ठतर उत्पाद के लिए चुनने का विकल्प नहीं बचा। वर्तमान की इस समझ को भविष्यवाणी के अंदाज में इस तरह आगे बढाया जाता है कि नव-उदारवाद की यह विजय स्थायी विजय है। नव उदारवाद के इस सांयोगिक विजय को उत्तर आधुनिक विचारक फुकुयामा दार्शनिक आधार प्रदान करते हैं। वे इसे 'इतिहास के अंत'2 के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसमें हेगेल के इस विचार को कि 'इतिहास स्वतंत्रता की तलाश है'3 का विस्तृत विवेचन कर यह निष्कर्ष दिया गया है कि 'मानवता अब 'स्वतंत्रता की अंतिम अवस्था' में पहुंच चुकी है। फिर इस उत्तर-ऐतिहासिक विचार को ल्योतार जैसे चिंतक इस रूप में प्रस्तुत करते हैं कि समाजवादी परियोजना की पराजय 'उत्पादन प्रणाली के महाआख्यान' से या 'प्रगति के महाआख्यान' से मुक्ति4 है। ल्योतार इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग के आनंद ने प्रजाति के भ्रमों को दूर कर दिया है। भूमंडलीकरण या वैश्विक व्यवस्था को इस रूप में अपरिहार्य बताकर पेश किया जा रहा है।

भूमंडलीकरण की अपरिहार्यता सुनिश्चित और निर्विकल्पक बनाने के लिए विकसित पूंजीवादी देशों ने जो चालाकियां की हैं, उन्हें देखना जरूरी है। एक तरफ इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का वह संजाल जिसके जरिये यह भूमंडलीकरण होता है, और दूसरी तरफ हैं कर्जों की वह विधियां जिसके जरिये दक्षिणी देशों के संसाधन उत्तरी देशों में पहले ही जा चुके हैं। विशेष रूप से 1980 के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी गयी थी कि एक के बाद एक देश को इन संस्थाओं की सर्वोच्चता को स्वीकार करना पड़ा था। विलियम ग्राफ ने इन संस्थाओं के बारे में कहा है कि 'विश्व-बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, बहुत बडी व्यूह-रचना की भांति फैली हुई अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों ने मिलकर एक प्रकार का पार-राष्ट्रीय छद्म राज्य बना लिया है। इस छद्म राज्य ने ऐसे नियम-कानून बना रखे हैं कि उनके अंतर्गत एक स्थानीय राज्य को अंतर्राष्ट्रीय पूंजी संचय के क्षेत्र में ही काम करने को बाध्य होना पडता है।'5 स्पष्टतः यह साम्राज्यवादी देशों का नव-उपनिवेशवादी छद्म है जिसमें 'विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष ने 1980 के दशक के ऋण संकट को क्रियाविधि का औजार बना लिया है।'6

भूमंडलीकरण की इस रचना प्रक्रिया के संदर्भ में ही वर्तमान के जातीय-राष्ट्र और राष्ट्रवाद के उभार को देखने की जरूरत है। बेनेडिक्ट एन्डरसन की यह अवधारणा कि 'जाति (नेशन) एक कल्पित समुदाय है'7 और वह इसलिए कि 'छोटी-से-छोटी जाति के सदस्य भी अपने सभी सदस्यों को कभी न जान सकेंगे, फिर प्रत्येक के मन में उनके आपसी संपर्क का बिम्ब रहता है।'8 एन्डरसन एक तरफ जाति को काल्पनिक मानते हैं वहीं वे उनके मन में 'बिम्ब' की भी कल्पना कर बैठते हैं। बिम्ब का आधार अमूर्त्त नहीं होता। उसका आधार सामाजिक यथार्थ होता है। जाति की इस अवधारणा के पीछे एन्डरसन तीन चीजों की चर्चा विशेष रूप से करते हैं। वे हैं जनगणना, नक्शा और अजायबघर। जनगणना के विभिन्न प्रदेशों, क्षेत्रों में बंटे लोगों को एक ही प्रशासनिक इकाई में बटोर लिया गया; तो नक्शा से बहुत सारी जातियों, प्रदेशों को नक्शे में एक ही जगह दिखा दिया और अजायबघर में प्राचीनकाल पहचानकर उसे वर्तमान से जोड़ देते थे। अगर जाति (राष्ट्र) के निर्माण की इस प्रविधि को माना जाय तो बहुजातीय राज्यों का ही उदय होना चाहिए। जबकि एन्डरसन एक जातीय राष्ट्रों की ही वकालत करते नजर आते हैं। ऐंडरसन एवं उनसे प्रभावित तमाम उत्तर-आधुनिक विचारक जाति के गठन में तकनीकी विकास को प्रमुख मानते हैं। 'प्रिंट कैपेटलिज्म' को ऐंडरसन एक प्रमुख कारक के रूप में स्थापित करते हैं। इसके माध्यम से फ्रांसीसी क्रांति की नकल रूसी क्रांतिकारी करते हैं। ऐंडरसन के इस निष्कर्ष को यदि सही मान लें तो उनकी जाति की अवधारणा खंडित होती है।

जातियों का गठन एकबारगी नहीं हुआ है। 'पूंजीवाद के जिस दौर में जातियों का विकास होता है, वह औद्योगिक पूंजीवाद से पहले का है अर्थात् वह व्यापारिक पूंजीवाद का दौर है।'9 धर्म के आधार पर यदि जाति का गठन होता तो अफगानिस्तान, अरब, ईरान, तुर्की सब में एक ही जाति बसती। परन्तु व्यवहार में इनकी अलग अलग संस्कृति है, भाषा है, इनके राज्य अलग-अलग हैं। यदि यह गठन भाषा आधारित होती तो अमेरिका और ब्रिटेन एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं लेकिन वे अलग हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ''सबसे पहले आर्थिक संबंध, उसके बाद भाषा, संस्कृति, ऐतिहासिक परंपराएं इन सबसे जाति का स्वरूप निर्धारित होता है।''10

भूमंडलीकरण को राष्ट्र-राज्य का विरोधी माना जा रहा है। इसलिए 'नये' 'राष्ट्रवाद' को पहचान के प्रश्न से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो रही है। जबकि फ्रांसीसी क्रांति प्रेरित सभी राजनीतिक दर्शन - हेगेल से लेकर क्रोंचे तक और क्रोंचे से लेकर ग्राम्सी तक - 'राज्य को विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में लोगों की सुधार और प्रगति की जरूरतों को पूरा करने वाले एक नैतिक और शैक्षिक प्रकार्य के रूप में देखने की परंपरा रही है।'11 चूंकि राष्ट्र-राज्य और भूमंडलीकरण दोनों ही पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली की देन हैं अतः भूमंडलीकरण कभी-भी कमजोर राष्ट्र-राज्य नहीं चाहता। राष्ट्र-राज्य जितना मजबूत होगा उसके नागरिक की पूंजी उतनी ही सुरक्षा से विदेश-भ्रमण कर सकेगी। इस विश्व-व्यवस्था को अधिक-से-अधिक राज्यों की जरूरत है। यहां राज्य के मजबूत होने का अर्थ है, पूंजी का स्वतंत्र होना। अर्थात् ऐसी व्यवस्था जिसमें पूंजी अपना पुनरूत्पादन स्वतंत्रतापूर्वक एवं लाभ सहित कर सके। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण पुराने साम्राज्यवाद का ही नया संस्करण है जो जातीय राज्यों को अपने बाजार के लिए एक-बार फिर संगठित (विघटित) करने को उतावला है। वह 'धर्मनिरपेक्ष' नागरिकता वाले बहुजातीय राज्यों की एकता के लिए घातक हैं।

भूमंडलीकरण के नाम पर एक तरफ विकसित पूंजीवादी देश अपना आर्थिक एकीकरण की ओर बढ़ रहे हैं तो वहीं दूसरी और तीसरी दुनिया के देशों में विघटन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। 1960 के बाद से हम देख रहे हैं कि न केवल पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं में एका हो रहा है, बल्कि सभी विकसित पूंजीवादी देशों के बीच एकता के बहुत से तरीके निकल आये हैं।'12 फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित तमाम बुद्धिजीवियों ने जिस राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद की अवधारणा विकसित की थी वह वैधानिकता पर टिका था। और यह वैधानिकता धार्मिक सत्ता एवं सामंती व्यवस्था के विरूद्ध थी। इसका मतलब था अधीनता से नागरिकता में एवं कर्तव्यों से अधिकारों में संक्रमण। इनमें से किसी भी अवधारणा में राष्ट्र-राज्य को एथनोस की अभिव्यक्ति या संस्कृति की एक अभिव्यक्ति नहीं माना जाता। इस प्रकार आज जो पुनरूत्थानवाद, सांस्कृतिक भेद-भाव, बहुसंखयावाद आदि दिखाई पड़ता है, वह न तो आकस्मिक है, और न ही आदिम चीजों का विस्फोट। यह दरअसल भूमंडलीकरण का अनिवार्य परिणाम है।

व्यापारिक पूंजीवाद के दौर से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक जातियों का गठन और फिर पुनर्गठन वास्तव में आर्थिक आधार पर ही हुआ है। बाद में विकास-क्रम से भाषा और संस्कृति ने उनकी एकता को मजबूत आधार दिया। परन्तु भाषा और धर्म आधारित राष्ट्र-राज्य कहीं बनता हुआ (इतिहास में) नहीं दिखता। 'दूसरे महायुद्ध के बाद जैसे-जैसे यूरोप के पूंजीपतियों के साम्राज्य संकुचित हुए या समाप्त हुए वैसे-वैसे मजदूरों को अपना शोषण अखरने लगा, बेकारों की संखया मुद्रास्फीति की तरह निरन्तर बढती गई, फलतः समाज में वर्ग-संघर्ष तेज हुआ। इसके साथ एक दूसरी प्रक्रिया आरंभ हुई। जिन भाषाओं और जातियों का अस्तित्व लुप्त मान लिया गया था, वे रंगमंच पर फिर आ गई, प्रभुत्वशाली जाति के पूंजीपतियों का शिकंजा ढीला होते ही उन्होंने अपनी स्वायत्तता या स्वतंत्रता की मांग करना शुरू कर दिया।'13 स्वायत्तता या स्वतंत्रता की इस मांग को यूरोप केन्द्रित चिंतक एवं पूंजीपति अपने आर्थिक हितों के लिए उपयोग करने लगे। चूंकि यूरोप भाषा, धर्म और रीति-रिवाज संबंधी सांस्कृतिक विशिष्टताएं राष्ट्रवाद का आधार थीं, इसलिए शेष विश्व में भी ऐसा ही होना चाहिए। आजकल जातीय जीवन-प्रणाली की एक (केन्द्राभिसारी) सेंट्रीपेटल छवि को उभारा जा रहा है और उसे केन्द्रापसारी, बुद्धिजीवी खुले दिमाग वाले समाज से श्रेष्ठतर एवं लाभदायक बताया जाता है। अपने व्यापक सांस्कृतिक विस्तार में भिन्न-भिन्न जातीय समुदायों की परस्पर निर्भरता को अनदेखी किया जाता है तथा इन विभिन्न समुदायों में कोई समान अवधारणात्मक आधार हो सकता है इसे छिपाया जाता है। परिणामस्वरूप समानता के बजाय भिन्नता की खोज आज अधिक होती है। यह उत्तर-आधुनिक प्रविधि है। साम्राज्यवादी देश तीसरी दुनिया के सामासिक राष्ट्रवाद को जातीय (एथनिक या नस्लवादी) राष्ट्रवाद में परिवर्तित करने में सफल हो रहे हैं।

एजाज अहमद ने अपने एक व्याखन में कहा है कि 'पूंजी चाहे राष्ट्रीय हो या पार-राष्ट्रीय, कमजोर राष्ट्र-राज्य नहीं चाहती, बल्कि ऐसा राज्य चाहती है जो पूंजी के संबंध में मजबूत हो।'14 यह कहा जा रहा है कि पहले के उपनिवेशों में राष्ट्र-राज्य की अवनति हुई है। यह अवनति वास्तव में अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण की परियोजनाओं और श्रमिकों-किसानों के हक देने के मामले में हुई है। राष्ट्र-राज्य अब विदेशी-पूंजी के रक्षक हुए हैं। तीसरी दुनिया में श्रमिक और किसान असुरक्षित हुए हैं। विश्व पूंजीवाद एक तरफ राज्यों को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है तो दूसरी तरफ असंतुष्ट श्रमिकों-किसानों को अपनी यूरो-अमरीकी केन्द्रित स्थनिक जातीय राज्य के अनुसार स्वतंत्रता को हवा भी दे रहा है। ज्यों-ज्यों मनुष्यों को अपने देशों में जीना दूभर होता जाता है, त्यों-त्यों राष्ट्रीय निष्ठा की पुरानी धारणा टूटती जाती है। इसलिए राष्ट्र और राष्ट्रवाद का अर्थ बीसवीं सदी में उत्तरार्द्ध तक आते-आते बदल गया। उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक 'राष्ट्रवाद' सामंती, औपनिवेशिक गुलामी से मनुष्य की मुक्ति का आह्वान था। अब यह आंदोलन जहां भी चल रहा है, वहां आमतौर पर जनता को विभाजित ही कर रहा है। एक तरफ यह धर्म, भाषा, नस्ल आदि भेदभावों को मिटाकर एकता का सूत्र पिरोता था तो अब यह जनता को कहीं एपनिसिटी के नाम पर, कहीं भाषा के नाम पर तो कहीं धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर विभाजित कर रहा है। 'अब ये राष्ट्रीय मुक्ति के आंदोलन नहीं, बल्कि राष्ट्रीयता की मुक्ति या जातीयता की शुद्धि के आंदोलन हैं।'15 यह एक अजीब विडंबना है कि राष्ट्रवादी हुए बिना साम्राज्यवाद (नव) के विरूद्ध संघर्ष करना संभव नहीं परन्तु इस साम्राज्यवाद ने राष्ट्रवाद को व्यर्थ करने या अपने हित में इस्तेमाल करने के नये तरीके विकसित कर लिये हैं।

अतः आज की स्थिाति में राष्ट्रवाद के कम-से-कम दो रूप मौजूद हंए एक, प्रगतिशील, साम्राज्य-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद। दूसरा, धर्म-निरपेक्षता-विरोधी (साम्प्रदायिक) और बहुसंख्यावादी राष्ट्रवाद।

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1. कथन, 23, जुलाई-सितम्बर – 1999.
2. End of History
3. कथन
4. द पोस्ट मोडर्न कंडीशन में इसका विवेचन है।
5. दि स्टेट इन दि थर्ल्ड वर्ल्ड, सोसलिटर रजिस्टर, 1995 में
6. वही
7. इमैजिन्ड कम्युनिटीज - 15
8. वही
9. भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश - 721
10. वही - 726
11. कथन
12. वही
13. भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं - 20
14. 3/12/98 को यॉर्क विश्वविद्यालय में एजाज अहमद के व्याखयान से
15. कथन - 63

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डॉ. अनिल कुमार से साभार

पीछे देखें :


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