*** व्याख्या : गाँव का महाजन

गाँव का महाजन

वह समाज के त्रस्त क्षेत्र का मस्त महाजन,
गौरव के गोबर-गनेश-सा मारे आसन,
नारिकेल-से सिर पर बाँधे धर्म-मुरैठा,
ग्राम-बधूटी की गौरी-गोदी पर बैठा,
नागमुखी पैतृक सम्पति की थैली खोले,
जीभ निकाले, बात बनाता करूणा घोले,
ब्याज-स्तुति से बाँट रहा है रूपया-पैसा,
सदियों पहले से होता आया है ऐसा!!

सूड़ लपेटे है कर्जे की ग्रामीणों को,
मुक्ति अभी तक नहीं मिली है इन दीनों को,
इन दीनों के ऋण का रोकड़-कांड बड़ा है,
अब भी किन्तु अछूता शोषण-कांड पड़ा है।

----------------------केदारनाथ अग्रवाल (फूल नहीं रंग बोलते हैं)


कविता की व्याख्या

केदारनाथ अग्रवाल के जीवन में एक ओर ग्रामीण जीवन दूसरी ओर शहरी औद्योगिक जीवन है। दोनों तरह की अनुभव वस्तु उनके काव्य में है। इस अर्थ में केदार की कविता आधुनिक भारतीय जीवन का प्रतिनिधित्व करती है।

हिन्दी काव्य परम्परा में कभी ऐसा कोई कवि नहीं आया जिसने जनता को दुख देने वाले वर्ग का समर्थन किया हो। अत्याचार के प्रति विद्रोह की भावना मौजूद रही है। केदार उसी की अगली कड़ी हैं।

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'गाँव का महाजन' महाजनी पूँजी के सूदखोरी फँदे के विषय की कविता है। ग्रामीणों को महाजन के कर्जे से मुक्ति मिले यह प्रेरणा है। साधारण ग्रामीण उनकी संवेदना और महाजन उनकी घृणा का विषय है। गाँव हो या शहर वर्ग शोषण और वर्ग उत्पीड़न भारतीय समाज का यथार्थ है। केदार इस संघर्ष में तटस्थ नहीं हैं। यही केदार के रचना की शक्ति है। यह शक्ति एक तन्मय आवेग शक्ति है, उसका कारण यही पक्षधरता है। तटस्थ होने पर भावना का आवेश नहीं हो सकता। जिसके प्रति कोई लगाव होगा उसके प्रति ही भाव का आवेग होगा। केदार यदि यह पक्षधरता चुनते हैं तो यह भी साहित्य परम्परा के अनुकूल है। केदार अपनी विचारधारा के कारण इस पक्षधरता को बहुत उन्नत स्तर तक ले जाते हैं।

कविता के त्रस्त-मस्त में एक चमत्कारी संयोग और तुक है। यह अनुप्रास कवि और पाठक दोनों को आकर्षित करता है। अनुप्रास प्रेम कविता के क्षेत्र से निरपेक्ष नहीं हा सकता। अनुप्रास विषय वस्तु को अधिक उद्भासित करने के लिए है। त्रस्त-मस्त विरोधी अर्थ देते हैं। समाज त्रस्त है, महाजन मस्त है। एक ही समय में। पहली पंक्ति में ही समाज की विषमता का चित्र खींच दिया। यह केदार के कला की विशेषता है।

“गोबर-गनेश” मुहावरा है। इस तरह के मुहावरे का स्रोत ग्रामीण जीवन ही है। महाजन गाँव का है, परिवेश गाँव का है, मुहावरा भी गाँव का है। अंतर्वस्तु या विचित्र जीवन से भाषा और मुहावरा अटूट रूप से बंधा है। यह कलात्मक प्रयोग का ऐसा गुण है जिसके लिए अंतर्वस्तु पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है। गोबर-गनेश वही है जो व्यर्थ होकर भी आदरास्पद हो। जो चीज़ अनुपयोगी है उसे आदर देना, इसीलिए गौरव के गोबर गनेश हैं। यही गाँव के महाजन का दर्जा है। बिम्ब में ही कवि की विचारधारा ध्वनित होती है। ऐंगेल्स ने लासाल के नाम लिखे एक पत्र में कहा था-
रचना में विचारधारा जितनी छिपी रहे रचना उतनी मूल्यवान व प्रभावशाली होती है।

केदार के कविता में अंतर्निहित होकर विचारधारा ध्वनित होती है, विचारधारा के आधार पर ही कविता संगठित नहीं होती। गोबर को गनेश बनाने के लिए ग्रामीण शोषित जन विवश है। इस विवशता के दो कारण है। एक व्यवस्था का प्रभाव, दूसरा महाजन पर विश्वास। विश्वास यथार्थ से कम वास्तविक नहीं होता, क्योंकि विश्वास के ही नशे में आदमी कई ऐसे काम करता है जो उसे नहीं करने चाहिए। कविता के बिम्ब इन चीज़ों को मिलाकर किए गए हैं।

महाजन के सिर पर बंधा मुरैठा धार्मिक कर्मकाण्ड का ऐसा संकेत चित्र है जिससे गाँव के सारे सामाजिक सांस्कृतिक भावानात्मक जीवन का चित्रण किया गया है। पूजा की बेदी का दृश्य भी इसी संदर्भ में आता है। लेकिन यथार्थ इसके ठीक विपरीत है।

नागमुखी में श्लेष है। नागमुखी एक ओर पूजा की वस्तु है। दूसरी ओर यह अटूट फंदे का नाम है जो अपनी लपेट में लेने पर छोड़ता नहीं है। हमारे समाज में भय और सौन्दर्य दोनों की उपासना होती है। केदार समाज के इस सांस्कृतकि द्वन्द्व को चित्र में खींच देते हैं।

महाजन जिस थैली को खोले बैठा है वह उसकी पैतृक सम्पत्ति है। जिसे उसने अपने श्रम से अर्जित नहीं की है। सम्पत्ति ही विषमता का कारण है। यह विषमता भी पैतृक है।

जीभ निकालने में लालच भी है, दंश भी। यह संशलिष्ट अर्थ है। महाजन अपने दोनों रूपों को छूपा कर जो भाषा बोलता है वह करूणा की है। अर्थात् करूणा उसका आडम्बर है। लालच और दंश इस आडम्बर की अंतर्वस्तु है। केदार मनुष्य के आचरण को उसकी संस्कृति से अभिन्न करके देखते हैं। पर महाजनी आचरणवाली, आडम्बरवाली संस्कृति शोषकवर्ग की संस्कृति है, जन संस्कृति नहीं है। जन संस्कृति में वस्तु और रूपÐविधान के बीच ऐसा अंतराल नहीं होता। भाषा और अर्थ में, शब्द और अर्थ में, अंतर्वस्तु और रूप में ऐसा अंतर्विराध नहीं होता है।

कविता में इतना संशलिष्ट चित्रण है फिर भी केदार की भाषा बिल्कुल सहज बनी रहती है। मुक्तिबोध की तरह उनकी भाषा अंतर्वस्तु की जटिलता के साथ दुरूह नहीं होती। मुक्तिबोध की भाषा वहीं सरल है जहाँ आवेग ज्यादा है और अंतर्वस्तु शिथिल होती है। अच्छी कविता सदा अंतर्वस्तु और रूपÐविधान के अनिवार्य संबंध से जन्म लेती है। इसीलिए राजेश जोशी ने केदारनाथ अग्रवाल को दुरूह सहजता का कवि कहा है।

कविता में केदार ने महाजन के आचरण और उद्देश्य के दोनों अर्थ ध्वनित करने के लिए ब्याजस्तुति का प्रयोग किया है। कवि ने पुराने काव्यशास्त्र की कई चीज़ों का उपयोग बड़ी कुशलता एवं सफलता से किया है। कवि का उद्देश्य इतना ही कह देना मात्र नहीं है। शोषण की इस निरंतरता को वर्तमान से जोड़ना कवि का उद्देश्य है। यह उनका संवेदनात्मक अभिप्राय है। टिप्पणी होकर भी ये पंक्तियाँ कविता की संरचना को खंडित नहीं करती। बल्कि अनेक मूल चिंतन को सारवान और प्रासंगिक बना देती है। यह कला की अन्य विशेषता है।

कवि इन बातों को इसलिए कहना चाहता है, क्योंकि कवि उसे बदलना चाहता है। जिससे मुक्ति नहीं मिली है दीनों को कवि उसकी निरंतरता एवं वर्तमानता को खंडित करना चाहते हैं। जो आज भी अछूता है। शोषण से मुक्ति के इस राह में विचारधारा की भूमिका है, जो इस कविता में ध्वनित होकर ही स्पष्ट हो जाता है।

4 comments

श्यामल सुमन September 11, 2009 at 8:44 PM

हकीकत को सुन्दरता से पेश किया है आपने।

संजय तिवारी September 12, 2009 at 7:09 AM

आपकी लेखन शैली का कायल हूँ. बधाई.

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