*** उत्तर-छायावाद


व्य की रचनाधर्मिता समयानुरूप बहुध्रुवीय होती है. छायावादी काव्य सांस्कृतिक नवजागरण लेकर आया था, किन्तु सन् 1930 के बाद से उसमें परिवर्तन के कुछ लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे. वस्तुत: 'उत्तर छायावाद' नाम से जिस काव्य प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता है वह एक अल्पकालिक काव्य प्रवृत्ति रही है. उसका कार्य छायावादी काव्य को बदलना तथा एक जागृत युग की पृष्ठभूमि तैयार करना था. यूँ तो जैसा कि ऊपर संकेत किया गया है, इस आशय के प्रयास सन् '30 से ही दृष्टिगोचर हो रहे थे, तथापि सन् '34 और सन् '37 के बीच इस वर्ग के कवियों ने छायावाद विरोधी पृष्ठभूमि तैयार कर ली थी. एक ओर कामायनी के माध्यम से छायावाद ने अपनी मानसिक योजनाओं को साकार कर संभावनाओं को नि:शेष कर दिया था. दूसरी ओर पंत ने युगांत की घोषणा कर दी थी. इस घोषणा को ऊँचे स्वर में पहले से ही परिवर्तन के लिए कटिबद्धता मध्यवर्गीय कवियों ने ग्रहण किया. सन् '34 में आचार्य नरेन्द्र देव के सभापतित्व में काँग्रेस में समाजवादी दल की स्थापना और 1936 में 'प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना जैसे राजनीतिक और साहित्यिक संगठनों से कवियों को पर्याप्त शक्ति मिली.

उत्तर-छायावाद काल के कवियों में हरिवंशराय बच्चन, अंचल, नरेन्द्र, आरसीप्रसाद सिंह और भगवतीचरण वर्मा की गिनती की जाती है. इनके अतिरिक्त 'दिनकर' और 'सुमन' आदि के आरंभिक काव्य में भी ये प्रवृत्तियाँ मिलती हैं. ये कवि मूलत: गीतकार हैं. अपनी मांसल, शरीरी वासनाओं और सामाजिक वर्जनाओं के कारण पलायन की अनुभूति को प्रत्यक्षत: व्यक्त करते हुए अभिव्यक्ति को अनलंकृत करने में और नवीनता की आवश्यकता को इन कवियों ने साकार किया है. उत्तर छायावादी कवि सीधे, सरल और ईमानदारी से अपनी अनुभूति का प्रकाशन करने लगे. इन्होंने जो कुछ अनुभव किया, उसमें से बहुत कुछ छायावादी ढंग का भी था, पर उनके कहने की पद्धति में अंतर स्पष्ट था. इनकी काव्य यात्रा में छायावाद के चिह्न आवरणहीन होकर और प्रगतिवादी साहित्य की सूचना दिखाई देती है. आवरण को हटाने के लोभ में वे कहीं-कहीं इतने नंगे हो गये कि रीतिकालीन साहित्य की एक दिशा का आभास होने लगा. उनका आरंभिक काल प्रणय के स्पष्ट, स्थूल और शरीरी रूप को व्यक्त करता है. वैयक्तिक जीवन में प्रणय-तुष्टि की इनका लक्ष्य रहने के कारण काव्य में अतृप्ति, निराशा तथा क्षोभ का वातावरण तैयार हो गया. कभी

इस पार प्रिये मधु है, तुम हो
उस पार न जाने क्या होगा

और कभी

यदि मुझे उस पार में भी मिलन का विश्वास होता
सत्य कहता हूँ न मैं असहाय व निरूपाय होता

की विविध आशा-निराशा के द्वन्द्व की भूमिकाएँ इन कवियों के वैचारिक जगत को आन्दोलित करती रही. इनका काव्य इस दिशा में उत्तरोत्तर नग्न होता गया. जीवन के विकास में जिन प्रतिमानों को नकारा गया है, इन कवियों ने उन्हें पर्याप्त स्वीकृति दी.

उत्तर छायावाद के जन्म का कारण खोजते समय प्राय: यह कहा गया है कि वह छायावाद की परम्परा से कटकर आया. वस्तुत: ऐसा कहना अति सरलीकरण होगा. यह छायावाद का ही विकास था, अपने ढंग से. जिसे कुछ लोग संक्रांतिकाल भी कहते हैं. उत्तर छायावाद में सौन्दर्योपासना, मानवता के प्रति आस्था, नारी-प्रेम, भक्ति और अराधना आदि बिन्दु समान है. बदली है तो अभिव्यंजना प्रणाली. अस्तु छायावाद की प्रतिक्रिया में इस नये साहित्य ने जन्म तो अवश्य लिया परन्तु मूल्यों की उपलब्धि की दृष्टि से इसका उतना महत्त्व नहीं है. प्रसाद-पंत-निराला के समानधर्मी कवि इस वर्ग में न आ सके.

उत्तरछायावाद की काव्य प्रवृत्तियाँ

1. वैयक्तिक अभावों की सहज स्वीकृति

इस युग के कवियों ने अपने ही नहीं समाज के प्रत्येक व्यक्ति के अभावों को समझा और नैतिक बंधनों को तोड़कर तद्रूपता के साथ व्यक्त किया. बच्चन ने खैयाम की मधुशाला की भूमिका में लिखा है:

मानव को जीवन में जब अधिक निराशा और दु:ख मिलेगा तो यह स्वाभाविक है कि यदि उसे आनंद का एक क्षण भी मिले तो वह विगत और आगत की चिंता छोड़कर उसका उपभोग करे.

नरेन्द्र, बच्चन और अंचल में यही जीवन-दृष्टि दिखाई पड़ती है.

2. जीवन संघर्ष से पलायन

छायावादी कवियों को भी पलायनवादी कहा जाता था और इन्हें भी. किन्तु दोनों में अंतर यह है कि छायावादी कवियों ने समाज के साथ अपने बाह्य संबंधों की अपेक्षा अंत: संबंध स्थापित किये, जबकि इन कवियों का पलायन एक प्रकार से विषम समाज के प्रति नकार और अस्वीकार का था. वे अपने संघर्ष और पराजय को भूलने के लिए मस्ती, मादकता और बेसुधी का वातावरण तैयार करते हैं.

3. शरीरी भोग एवं ऐन्द्रिकता

उत्तर छायावादी कवि अपनी वासनात्मक तुष्टि को सामाजिक हेय की वस्तु नहीं रहने देना चाहते. आलिंगन और चुंबन जैसी रति-क्रिड़ाओं को व्यक्त करने में इन्हें कोई संकोच नहीं:

तब से मना मना हारेंगे वारेंगे वारेंगे लाखों मधु चुंबन
****
आ जाओ, आ मेरे समीप सम्पूर्ण नग्न, एकान्त नग्न

4. ईश्वर के प्रति विरोध की भावना

इन कवियों ने ऐसे ईश्वर के प्रति अपनी अनास्था व्यक्त की है जो लोककल्याणकारी और समदर्शी नहीं है. हालांकि इन कवियों की परवर्ती रचनाओं में ईश्वर के प्रति आस्था भी व्यक्त की गई है. बच्चन मठ, मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर को पराजय के स्मारक मानते हैं:

मनुज पराजय के स्मारक हैं, मठ, मस्जिद, गिरजाघर
नरेन्द्र, आरसी और अंचल के काव्य में ईश्वर का तिरस्कार किया गया है.

5. सक्रिय जीवन शक्ति का अभाव

उत्तरछायावादी कवि ईश्वर-विरोधी और प्रकृत शक्तियों के प्रति निष्ठावान होते हुए भी निष्क्रिय और नियतिवादी हो गए थे. वे अपनी प्रिया की गोद में सोकर जगत के आवागमन से मुक्ति चाहते हैं. ये कवि नियति के अत्याचारों यथार्थ चितेरे होते हुए भी परवर्ती काल में उसके प्रशंसक हो जाते हैं. बच्चन ने लिखा है:

हम जिस क्षण में जो करते हैं
हम बाध्य वही हैं करने को

6. समाज से संघर्ष का द्वन्द्व

प्रकृतवादियों की भाँति ये कवि इन्द्रिय भोगों पर विश्वास करते थे और जीवन की क्षणभंगुरता में आस्था रखते थे, साथ ही

अपने सिवा और भी कुछ है जिस पर मैं निर्भर हूँ
मेरी प्यास हो न हो जब को मैं प्यासा निर्झर हूँ

कहकर जगत और अज्ञात शक्ति पर निष्ठा रखना इन कवियों का वैचारिक परिप्रेक्ष्य था. ये समाज से कटकर जीने को अभिशप्त थे. हालांकि इनके यहाँ अपनी आत्मलीनता से बाहर आने की छटपटाहट भी है. बच्चन ने लिखा:

अपने से बाहर निकल देख
है विश्व खड़ा बाहें पसार

7. सहज सरल अभिव्यक्ति प्रणाली

उत्तरछायावादी कवि शास्त्रीय काव्य का सृजन नहीं करते. उनकी सृजनशक्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु भावावेश है. वस्तुत: गीत काव्य की सम्पूर्ण विशेषताओं से इनकी रचना आपूरित है. इनमें काव्य कौशल और रचना नैपुण्य का अभाव है. इनमें एक सुनिश्चित जीवन दर्शन का अभाव रहा है, जिसके आधार पर आगामी युगों के लिए कोई संदेश दे पाते.


डॉ. रमेश रावत से साभार

3 comments

Himanshu Pandey March 13, 2009 at 1:13 PM

सुन्दर आलेख । धन्यवाद

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर March 13, 2009 at 1:31 PM

अच्छे लेखन के लिए बधाई।
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र
नये रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को shabdkar@gmail.com पर रचनायें भेज सहयोग करें।

Victoria L August 3, 2022 at 11:20 AM

Greeat read thank you